सत्ता की भूख मिटाने के लिए वोट की भीख मांगने निकला एक युवराज अगर देने वाले को ही बार-बार भिखारी कहे और इस बात पर भी जोर दे कि वो अपनी बात पर अडिग है कि उसकी राजनीतिक समझ पर सवाल उठना लाजिमी है। उत्तर प्रदेश में सत्ता में वापसी का सपना देख रही कांग्रेस की अगुवाई कर रहे राहुल गांधी ने फूलपुर में चुनाव अभिायन की शुरुआत करते हुए जोशो खरोश में ये सवाल पूछ गये थे कि आखिर यूपी के लोग कब तक महाराष्ट्र जाकर भीख मांगते रहेंगे। तब उनका आशय था कि आखिर कब तक उन्हें अपने राज्य में काम के लिए तरसना होगा? कब तक पेट की आग बुझाने के लिए वो अपनी ज़मीन छोड़ कर दूसरे राज्य में काम की तलाश में जाते रहेंगे।
राजनीति में सब एक दूसरे पर हमले की ताक में बैठे रहते हैं, ऐसे में राहुल गांधी ने भी अपने विरोधियों को बैठे बिठाए एक मुद्दा थमा दिया था। उनके जुबान फिसलने पर कोफ्त जरूर हुई थी, लेकिन तब भी मुझे ये भरोसा था कि उनका इरादा बुरा नहीं था। लेकिन आज उन्होंने इस भरोसे को हिला दिया। उस दिन सबने कहा था कि राहुल ने उत्तर प्रदेश का अपमान किया। उस दिन किया कि नहीं, नहीं जानता लेकिन आज उन्होंने जरूर उत्तर प्रदेश का अपमान कर दिया।
आज उन्होंने एक तरह से साफ कर दिया कि उनका मतलब भिखारी से ही था। राहुल का कहना है कि उन्होंने बहुत भिखारियों से बात की और सबने यही कहा कि वो उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। अपने गलत बयान को तर्कसंगत ठहराने के लिए एक और गलत बयान। ऐसा क्यों हुआ कि उन्हें जो भी भिखारी मिला, वो उत्तर प्रदेश का ही मिला?ऐसा क्यों हुआ कि उन्होंने जिन भिखारियों से बात की वो सभी उत्तर प्रदेश के ही निकले ? क्या ये भिखारी भी सियासी हैं?
सवाल बहुत है लेकिन जवाब कौन देगा? इस सवाल का जवाब तो राहुल गांधी को ही देना होगा कि उनकी अपनी सरकार के ही योजना आयोग के उपाध्यक्ष जब ये कहते नहीं थक रहे थे कि गांवों में बीस रुपये और शहरों में 32 रुपये कमाने वाला आदमी गरीब नहीं माना जा सकता, तब उन्होंने मोंटेक सिंह अहुलवालिया से कोई सवाल क्यों नहीं पूछा? अगर उस वक्त उन्होंने सरकार की गरीबी की परिभाषा पर सवाल उठाया होता तो शायद आज उनके सवाल पर सियासत कम, गंभीरता से विचार ज्यादा होता।
वोट मांगने वाला याचक होता है और जब याचक देने वाले की हैसियत पर ही सवाल उठाने लगे तो उस याचक को लोग खाली हाथ लौटा देते हैं। वोट देकर सत्ता का सुख जो जनता आपको मुहैया कराती है, वो अगर भिखारी भी है तो भी वो आपसे बड़ा है। राहुल गांधी शायद अभी ये बात समझ नहीं पाये हैं, उनकी सियासी अपरिपक्वता पर किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए लेकिन उनके सलाहकार भी तो कहीं उन्हें दिग्भ्रमित नहीं कर रहे। अन्यथा एक विवाद जो थम रहा था, उसे उन्होंने खुद ही क्यों छेड़ दिया। चुनावी जंग जुबानी जंग से ही जीती जाती है, ऐसे में अगर जुबान फिसलती है तो ये राजनीतिक समझदारी का परिचायक किसी भी रूप में नहीं हो सकता।
राहुल गांधी ही नहीं बल्कि सभी राजनीतिक दलों को ये समझ लेना चाहिए कि भीख चाहे जिस किस्म का भी हो उसका संबंध भूख से ही होता है। अगर यूपी के लोग पेट की भूख के लिए भीख मांगने के लिए मजबूर हैं तो कहीं न कहीं इस बड़े राज्य के साथ होने वाली राजनीति ही है। जब तक लोगों की भूख से राजनीति होती रहेगी, तब तक उन्हें इधर-उधर भटकते रहना पड़ेगा, अपनी जमीन छोड़नी पड़ेगी, यानि आपके शब्दों में भीख मांगते रहना पड़ेगा। तो बेहतर ये नहीं होता कि आप जनता से सवाल पूछने की बजाय खुद इसका जवाब ढूंढिए।
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