Saturday, October 1, 2011

बीजेपी की विडंबना

भ्रष्टाचार का एजेंडा पीछे छूट गया। प्रधानमंत्री की कुर्सी सामने आ गई। जब सत्ता का सर्वोच्च पद सामने हो तो नेता का मन ना डोले ऐसा कैसे हो सकता है? मौजूदा दौर में आखिर आदमी राजनीति में सत्ता का स्वाद चखने के लिए ही तो आता है। भारतीय जनता पार्टी के साथ भी ऐसा ही हादसा हो गया। अमेरिकी कांग्रेस ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अगले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी का सबसे प्रबल दावेदार क्या बता दिया, बीजेपी की राजनीति की लाइन ही बदल गई। पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ डंका पीट रही पार्टी इस बहस में उलझकर रह गई है कि लालकृष्ण आडवाणी या नरेंद्र मोदी? आखिर कौन होगा बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार। इस पर भी बीजेपी तीन धड़ों में बंटी हुई है। कुछ आडवाणी के पक्ष में बयान दे रहे हैं तो कुछ मोदी के पक्ष में। और कुछ ने साध ली है चुप्पी।

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की मुहिम का समर्थन कर बीजेपी ने जो सियासी फायदे उठाने की कोशिश की, उस पर इस बहस ने पानी फेर दिया। बीजेपी अपने पक्ष में एक माहौल बनाने में कामयाब हो पाई थी। भ्रष्टाचार के लगातार आरोपों से घिरे यूपीए और खासतौर पर कांग्रेस की छवि को जिस तरह धक्का पहुंचा है, उसने बीजेपी का आधा काम ऐसे ही आसान कर दिया था, ऊपर से बीजेपी ने जनलोकपाल के लिए अन्ना के आंदोलन का समर्थन कर भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूती से खड़े एक दल के रूप में अपनी छवि पेश करने में सफल हुई थी। इसी मौके का फायदा उठाने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ रथयात्रा निकालने का ऐलान कर दिया और यहीं से बीजेपी में गड़बड़ी की शुरुआत हुई।

बीजेपी की नई पीढ़ी के नेताओं को लगा मानो प्रधानमंत्री बनने का अधूऱा ख्वाब एक बार फिर आडवाणी के मन में हिलारे मारने लगा है। हालांकि आडवाणी ने इस मामले में न केवल राष्ट्रीय स्यवं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत से मिलकर अपनी सफाई दी बल्कि ये ऐलान भी कर दिया कि वो प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नहीं हैं लेकिन राजनीति में ऐसे बयानों का कोई मतलब नहीं होता, ये सबको पता है। इसकी काट में नरेंद्र मोदी ने तीन दिन के उपवास का ऐलान किया। गुजरात मे ंसद्भावना के लिए उपवास। गुजरात की एकता के लिए उपवास। गुजरात की शांति के लिए उपवास लेकिन सबने कहा कि ये उपवास है प्रधानमंत्री बनने के लिए।

मोदी के इस सद्भावना मिशन के साथ ही बीजेपी से मानो सद्भावना गायब हो गई। प्रधानमंत्री पद के लिए काबिल उम्मीदवार की तलाश की जंग शुरू हो गई। भ्रष्टाचार के मूल एजेंडा बहुत पीछे छूट गया और इसके साथ ही बीजेपी ने वो बढ़त गंवा दी, जो उसने अन्ना के आंदोलन का समर्थन कर हासिल किया था।
अब तो बीजेपी में प्रधानमंत्री पद को लेकर इस तरह बहस चल रही है मानो बीजेपी ने लोकसभा चुनाव जीत लिया हो और सिर्फ प्रधानमंत्री का चयन बाकी है। ये बहस बीजेपी के भविष्य के लिए जाहिर तौर पर अच्छा नहीं है।

बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भी ये ही मुद्दा छाया रहा। हर बात होती रही लेकिन नेताओं के मन में मोदी बनाम आडवाणी की जंग चलती रही। बैठक में नहीं आकर भी बैठक पर मोदी छाये रहे। इस बहस में पड़ने की बजाय बीजेपी को ये समझ लेना चाहिए कि अगर उसे प्रधानमंत्री का पद हासिल करना है तो पहले लोकसभा चुनाव जीतना होगा और इसके लिए कडी मेहनत की जरूरत है न कि इस बात पर बहस करने कि कौन बनेगा प्रधानमंत्री।
प्रधानमंत्री बनने की हसरत पाल रहे मोदी को भी ये समझ लेना चाहिए की भारत गुजरात नहीं है। वो गुजरात में विधानसभा चुनाव जीत कर मुख्यमंत्री बनना और पूरे देश से जनसमर्थन हासिल कर प्रधानमंत्री बनने में जमीन आसमान का फर्क है। दंगों के ठीक बाद जब मैं 2002 में गुजरात विधानसभा चुनाव कवर करने गया था तो देखा था कि वहां धर्म के आधार पर समाज किस तरह बंटा हुआ है। सद्भावना मिशन ने इस बंटवारे को एक बार फिर ताजा कर दिया है। मोदी नेउपवास के जरिए सद्भावना के बहाने कहीं न कहीं ये संदेश भी दे दिया है कि वो वही मोदी हैं। मंच पर इमाम से टोपी स्वीकार न कर वो अपने कट्टर हिंदूवादी मतदाताओं को ये भरोसा देने में कामयाब रहे हैं कि सद्भावना मिशन सिवाय राजनीति के और कुछ नहीं। देश की जनता भी ये समझती है।अगर बीजेपी मोदी को आगे कर लोकसभा चुनाव लड़ने का सपना देखती है तो जाहिर है केंद्र में आने का उसका सपना सपना ही रह जाएगा।

1 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जाने क्या होगा आगे।

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के ब्लॉग पर आपका स्वागत है। ऐसे ही आते रहिए, अच्छा लगता है