Saturday, May 21, 2011

जिंदगी की तलाश

एक लम्हा

जिंदगी का तलाशता

ही रह गया

पता ही नहीं चला

कब खत्म हो गई

जिंदगी।

4 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सरल सा सच सरल से प्रस्तुत कर दिया।

समय said...

ज़िंदगी इससे जूझने में ही पकड़ आती है।

शुक्रिया।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

कम शब्दों में सच्ची बात ....

Devi Nangrani said...

Zindagi ki talash bhi ek mrigtrishna hai. Bahut achi rachna hai

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के ब्लॉग पर आपका स्वागत है। ऐसे ही आते रहिए, अच्छा लगता है