नूर मुहम्मद नूर की ग़ज़ल
सुबह का चावल नहीं है, रात का आटा नहीं
किसने ऐसा वक्त मेरे गांव में काटा नहीं।
शोर है कमियों ही कमियों का हर इक लम्हा यहां
मेरे घर में आजकल कोई भी सन्नाटा नहीं।
वक़्तेबद, यारे अदब, हुस्नेग़ज़ब, ए मेरे रब
किसने मेरे मुंह पे मारा खींचकर चांटा नहीं।
क्या हुआ पैसे नहीं मिलते, मगर मिलता है सुख
लिखने-पढ़ने में बहुत ज़्यादा मगर घाटा नहीं।
दर्दोग़म है भूख है पीड़ा है चोटें और दुख
इस नदी में ज्वार तो आए मगर भाटा नहीं।
Saturday, March 15, 2008
किसने मेरे मुंह पे मारा खींचकर चांटा नहीं।
Thursday, March 13, 2008
नंदीग्राम के आंसू
सुरेंद्र दीप की कविता
बंद थे घर
बंद हों जैसे
किसी गुजरती सवारी की सब खिड़कियां
बंद थे घर के दरवाजे
बंद पलकों की तरह
जाग रही थीं पुतलियां
दुबकी हुईं
निकल रही थीं हृदयविदारक चीखें
घुटी-घुटी
चल रही थी धुकधुकी
मरी-मरी
सहमी हुई थीं बेलगाम गलियां
एक छोर से दूसरे छोर तक
फैला हुआ था नियंत्रित आतंक
फैली हुई नसों की तरह
विकास के पिछले दरवाजे के पीछे
सिसक रहा था पिछड़ा गांव
जैसे डूबा हो मासूमों के आंसुओं में
यह खौफ़नाक अजानी रात
घुप्प अंधेरा पसरा हुआ चारों ओर
लगा जैसे महीनों सूरज न निकला हो
आतंक और दहशत
बरस रहे थे उस रोज
घने काले बादलों की तरह
एक रात में
कई-कई रातें थीं
और सुबह तक
अनवरत बरसती रहीं थर्राई आंखें
आंसुओं में होता है कितना धीरज
कितनी दृढ़ता, कितना साहस
होते हैं कितने घृणा के पत्थर
होती है कितनी आग आंसुओं में
यह सब मुझे दिखा उस दिन
नन्दीग्राम के आंसू में।
Wednesday, March 12, 2008
सपने में
शैलेंद्र की एक कविता
बैठ नदिया किनारे
अनवरत निहारे
दो बेचैन नैन
चमकते पानी में
झिलमिल तारे
सपने में
सपने टूट गए
अपने छूट गए
बहुत दूर
बार-बार उन्हें
आत्मा पुकारे
बस पुकारे
यह जानते हुए भी
कि यह पुकार
नहीं पहुंचने वाली
उन कानों तक
बस पुकारे

