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Thursday, July 24, 2008

शर्मनाक! शर्मनाक!!

कलावती। और लोकसभा ठहाकों से गूंज उठा। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ओर के सदस्य कलावती नाम पर दांते निपोरते नज़र आए। मानो कलावती कोई नाम नहीं हो बल्कि एक मजाक हो। हास्य रस से भरा चुटकुला हो। लेकिन इस चुटकुले में ज्यादा मजा नहीं आया। इतने से कलावती जैसी भूखी गरीब जनता का पूरा-पूरा मजाक नहीं उड़ा। इसलिए उसमें संशोधन किया गया--मिसेज कला। अब थोड़ी ज्यादा हंसी आई। बड़ी ही कलाकारी के साथ कला की गरीबी का मजाक बनाया गया, उड़ाया गया, ठहाका लगाया गया।
कलावती के बहाने संसद में बैठे लोगों ने अपना असली चरित्र और चेहरा दिखा दिया। भूखी बदहाल नंगी जनता उनके लिए मजाक से ज्यादा कुछ नहीं। राहुल गांधी ने जिस कलावती के दर्द को परमाणु करार के पक्ष में भूनाने की कोशिश की उस कलावती ने दो दिनों से खाना नहीं खाया था (टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट)। उसे परमाणु ऊर्जा की नहीं, रोटियों की जरूरत थी। लेकिन संसद ने उसकी गरीबी, उसके नाम, उसकी भूख हर चीज का मजाक बना दिया। कलावती के पास राशन खरीदने के पैसे नहीं थे, और संसद में लहराई जा रही थीं नोटों की गड्डियां और बताई जा रही थी कि हम बिकाऊ हैं। हमें खरीद लो। हमें सिर्फ नोटों की फिक्र है, कलावती जैसी गरीब जनता की नहीं।
राहुल ने कलावती का जिक्र किया। सांसद हंसे। मिसेज कला कहा। सांसद फिर हंसे। कलावती के दर्द ने हंसाया। किसी भी सांसद के दिल को उसका दर्द छू नहीं पाया। गरीब जनता के पेट में भूख की मरोड़ है और पीठ पर लगातार भारी होते जा रहे बूढ़े लाचार लोकतंत्र के बोझ को ढोने का दर्द। कलावती जैसी गरीब जनता की पीठ पर ही संसद टिकी है। वो इस बोझ को ढोते रहेंगे, इस कीमत पर भी कि उनका ही मजाक उड़ाया जाय। इस कीमत पर भी कि उनकी गाढ़ी कमाई के पैसों से सांसदों की खरीद फरोख्त की जाय।
संसद का बोझ सिर पे लिए घूम रहा हूं
चढ़ा है नशा मुफलिसी का झूम रहा हूं
गरीबों को अपनी गरीबी का नशा है, अफसोस नहीं है। अफसोस होता तो आक्रोश पैदा होता। आक्रोश पैदा होता तो कलावती के नाम पर संसद ठहाका नहीं लगाती। खैर, गरीब जनता के लिए दुष्यन्त कुमार के शब्दों में यही कहा जा सकता है—
भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल संसद में है, जेरे बहस-ए-मुद्दआ।

3 comments:

dhurvirodhi said...

राजकुमार को क्या मालूम कि भूख क्या है? कभी पाला ही नहीं पड़ा!
जनता की खुशकिस्मती है कि इसके होने से हमारे राजकुमार को हंसने का मौका मिला.
हमें तो खुश होना चाहिये कि हमारे राजकुमार कितने संवेदनशील हैं.

शोभा said...

एक कड़वा सच है यह। स्वीकारना तो होगा ही।

Gyandutt Pandey said...

भूख के साथ कभी कटाक्ष नहीं होने चाहियें। और जो उसे हास्य का मुद्दा बनाते हैं, उन्हे कुछ तो सोचना चाहिये।