सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के ब्लॉग पर आपका स्वागत है। ऐसे ही आते रहिए, अच्छा लगता है

 

 

Saturday, January 19, 2008

भालोबासा यानि मुहब्बत

शैलेंद्र की एक कविता

क्या पाप
क्या पुण्य
क्या काशी
क्या काबा
इंसानों के अन्दर
बची रहे आदमियत
साथ उनके बना रहे
सबसे सुन्दर शब्द
'भालोबासा'

4 comments:

सचिन लुधियानवी said...

सर्वेश्वर को याद दिला दिया...
इस दुनिया में आदमी की जात से बडा कुछ भी नहीं
न ईश्वर, न ज्ञान, न मजहब, न संविधान
इसके विरोध में लिखी कोई भी ईबारत फाडी जा सकती है
जमीन की सात परतों के भीतर गाडी जा सकती है

लेकिन गुरु जरा बताइये
आदमीयत को जीवित रखने के लिए
एक दारोगा को गोली मारने का अधिकार है
तो मुझे क्यों नहीं?

सचिन लुधियानवी said...

सर्वेश्वर को याद दिला दिया...
इस दुनिया में आदमी की जात से बडा कुछ भी नहीं
न ईश्वर, न ज्ञान, न मजहब, न संविधान
इसके विरोध में लिखी कोई भी ईबारत फाडी जा सकती है
जमीन की सात परतों के भीतर गाडी जा सकती है

लेकिन गुरु जरा बताइये
आदमीयत को जीवित रखने के लिए
एक दारोगा को गोली मारने का अधिकार है
तो मुझे क्यों नहीं?

प्रभाकर पाण्डेय said...

दिल को छू जानेवाली रचना। बिलकुल ठीक। सच्चाई की सच्चाई है यह रचना।

Mired Mirage said...

सुन्दर! पूर्णतया सहमत हूँ ।
घुघूती बासूती