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Thursday, January 10, 2008

नारी दिवस

सुरेंद्र दीप की एक कविता

अंगीठी सी सुलगती रही
और सुलगाती रही अंगीठी

धीरे-धीरे वह
बदलती चली गई
अंगीठी के धुएं में
मगर घर की आबादी
बढ़ती गई।

अंगीठी सुलगाती रही
साथ ही जलती रही
कई-कई चिताएं
अरमानों की,
भावनाओं की,
रिश्तों की,

और होती रही तैयारी
नारी दिवस मनाने की।

1 comments:

परमजीत बाली said...

अच्छी रचना है।बधाई।