सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के ब्लॉग पर आपका स्वागत है। ऐसे ही आते रहिए, अच्छा लगता है

 

 

Monday, January 7, 2008

ताउम्र रोती रही एक औरत

मेरे दर्द में
डबडबा आती हैं उनकी आंखें

मेरी सफलता पर
भींग जाती हैं उनकी पलकें।

बेटे को तनिक तकलीफ भी हों
तो रो उठती हैं वो।

बेटे की सफलता पर भी
खुशी के आंसू बहाते देखा है उन्हें

हमारे ग़म को
अपने आंसुओं में बहाती रहीं

हमारी खुशियों को
अपने आंसुओं से चमकाती रहीं

कभी इस बहाने, कभी उस बहाने
बहते रहे उनके आंसू

ताउम्र रोती रहीं
लेकिन मैं नहीं समझ सका
अपनी ही बीवी का दर्द।

5 comments:

Mired Mirage said...

रोना समझना थोड़ा कठिन ही होता है । सबसे सरल हे रोते हुए व्यक्ति को चुप कराना ।
घुघूती बासूती

mehek said...

sach bada kathin hai,rote ko samjhna,wo bhi ek nari ki pida,samandar se gehri,koi purush chah kar bhi nahi samjh sakta,ek nari se behtar nari ko koi nahi jan sakta.

sunita (shanoo) said...

बहुत अच्छी रचना है...मगर अंतिम पंक्तियाँ कुछ खटक रही है शायद मेरे अल्पज्ञान कि वजह से समझ नही आ रही है...जो हर आँसू की भाषा समझ पा रहा है पत्नी का दर्द क्यों नही समझ पा रहा..

anuradha srivastav said...

बहुत खूब ..........जितना भी देख पाये या समझ पाये काफी है।

जेपी नारायण said...

सुनीता जी की टिप्पणी उचित है और एक बड़े प्रश्न की ओर ध्यान देने का संकेत करती है। अर्थात मां और स्री....