सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के ब्लॉग पर आपका स्वागत है। ऐसे ही आते रहिए, अच्छा लगता है

 

 

Sunday, December 9, 2007

तसलीमा के लिए




हालात-एक
एक औरत
चीखना चाहती है
बोलना चाहती है
निकाल देना चाहती है
अपने मन का
सारा गुबार
लेकिन
मुंह बंद कर रखा है
समाज ने
परिवार ने
नहीं हारती वो हिम्मत


पूरा जोर लगाकर
चीखना चाहती है वो
निकालना चाहती है
सच के दो बोल
बढ़ता जाता है
उसकी गर्दन पर दबाव
घुटने लगता है
उसक दम

हालात-दो
एक औरत
चीखना चाहती है
बहुत कुछ
बोलना चाहती है
लेकिन सब कहते हैं
बंद रखो जुबान
क्योंकि
जुबान खोलते ही
वो उगलती है
सच की आग
पड़ जाते हैं
कई जगह छाले

खूब लिखा है
खूब बोला उसने
उसके सच से
बुरी तरह झुलसा समाज
अब बंद करना चाहता है
उसकी जुबान
वो चीखना चाहती है
इस अत्याचार के खिलाफ़
निकालना चाहती है
सच के दो बोल
लेकिन बढ़ता जाता है
उसकी गर्दन पर दबाव
घुटने लगता है उसका दम।

Thursday, December 6, 2007

हक़ीक़त

कुत्ते हक़ीक़त जान गये हैं
इसलिए
अब वे रोटी के लिए
नहीं लड़ते

वे
जान गये हैं कि
रोटी के लिए ही
पूरी मानव सभ्यता
लड़-भिड़ कर
ख़त्म हो रही है

लेकिन
कुत्तों को बचानी है
अपनी सभ्यता

इसलिए
अब वे नहीं लड़ते
रोटी के लिए।