सितम दुनिया के यूं ही चुपचाप नहीं सहता हूं
बात जब हद से गुजर जाय, ग़ज़ल कहता हूं
नए ज़माने की हवा है, इसी में बहता हूं
बात जब कल की याद आए, ग़ज़ल कहता हूं।
जिनकी आंखों की नशे में मैं मगन रहता हूं
जब कभी सामने आए वो, ग़ज़ल कहता हूं।
भूख से बिलबिलाते गीत, ताज़गी गायब
जब कोई छंद मुरझाए, मैं ग़ज़ल कहता हूं।
Sunday, September 23, 2007
बात जब हद से गुजर जाय ग़ज़ल कहता हूं
Sunday, September 16, 2007
बिन बुलाए मेहमानों से परेशान
वायरस ने ऐसा आक्रान्त किया कि कंप्यूटर ही नहीं बहुत हद तक मैं भी ठप हो गया। सबकुछ बंद। ब्लॉग की दुनिया में प्रवेश मानो निषेध हो गया। पहले संदेह कि कहीं बीवी के छोड़े हुए वॉयरस तो नहीं। लंबे समय तक ब्लॉगिया दो तो फिर काफी खिटिर-पिटिर शुरू हो जाती है। सीधे नहीं भी बोले तो निशाने पर होता है ब्लॉग ही। हालांकि अब उसका भी ब्लॉग बनाने की साजिश रच रहा हूं। कामयाब हो गया तो शायद ज्यादा छूट मिल जाय।
लेकिन जांच से पता चला कि बीवी के छोड़े हुए वायरस नहीं हैं। बिन बुलाए खुद ही वाया इंटरनेट आए हैं। अब घर के दरवाजे से कोई बिन बुलाए आ जाय तो उसे अतिथि कहते हैं। भगवान का रूप। काम आपका तब भी ठप होता है लेकिन अतिथि देवोभव: का फॉर्मूला बना हुआ है। सो आंख बंद कर पालन कर लेते हैं। लेकिन अभी तक इस बारे में कोई मानदंड तय नहीं किया गया है कि इंटरनेट के जरिए जो अतिथि आते हैं, उनके साथ कैसा सलूक किया जाय। हालांकि बाज़ार में ऐसे मेहमानों के लिए इतने सारे एंटी अतिथि सॉफ्टवेयर मौजूद हैं कि एक अघोषित फॉर्मूला है ही कि इनके साथ क्या सलूक किया जाय।
वायरस आक्रान्त कंप्यूटर की ही मदद ली, इंटरनेट पर एंटी वायरस सॉफ्टवेयर खोजने में। हजारों सॉफ्टवेयर। स्कैन कर उनकी ख़बर सभी देते हैं लेकिन उनकी ख़बर लेने से हिचकते हैं। कहते हैं रजिस्टर करो। क्रेडिट कार्ड निकालो। मुफ्त में कैसे पा जाओगे छुट्टी। खैर आखिरकार एक सॉफ्टवेयर मिला। उसने वायरस खोजा भी और मारा भी लेकिन फिर शायद वो खुद भी उसी वायरस के शिकार हो गया। अब चाहे कितना भी क्लिकिया लो लेकिन वो भी खुलने का नाम नहीं ले रहा। तो मेहमान मजबूत हैं और मुस्तैदी से जमे हुए हैं।
समस्या यहीं तक नहीं है। कुछ वर्चुअल मेमोरी का भी प्रॉब्लम है। कंप्यूटर पर बैठता हूं तो कोयले से चलने वाले इंजन की याद आ जाती है। चलते-चलते चलती है। खैर, जल्द ही अब किसी विशेषज्ञ को बुलाऊंगा, कंप्यूटर साहब की खातिरदारी करवाऊंगा, तब शायद आपसे नियमित रूबरू हो पाऊं।

