सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के ब्लॉग पर आपका स्वागत है। ऐसे ही आते रहिए, अच्छा लगता है

 

 

Saturday, April 28, 2007

डर

अंतिम लोकल टेन से
घर वापसी का सफ़र
मानो
हर पल मर मर कर जीना।

हर स्टेशन पर
उतरते यात्री
डिब्बे को कम
मन को ज्यादा
खाली करते जाते हैं
पसरता जाता है
एक अनजान डर
हर खाली होते कोने में।

टेन पर सवार होता
हर इक्का-दुक्का यात्री
पहली बार
बड़ा ही डरावना लगता है
पर
बाद में वह
खुद भी डरा दिखता है।

एक-दूसरे की मौज़ूदगी से
साहस बटोरते
एक-दूसरे से डरते
अन्तत: हम
पहुंच ही जाते हैं
गंतव्य तक
नहीं घटती
कोई अनहोनी।

सर्कस

भूख, बेरोजगारी
गिड़गिड़ाने की लाचारी
भ्रष्टाचार, बेईमानी
अराजकता की बीमारी
उसी तेजी से फैल रही है
जैसे फैल रही हो
कोई संक्रामक महामारी।

वादों-आश्वासनों की
फूलझड़ी लिए
ज़ख्म को सहलाने के बहाने
कुरेदते हैं नेता
हमारे भाग्यविधाता
चुपचाप सहते हैं हम
दर्द की अब आदत हो गई है।

वादों-आश्वासनों की फूलझड़ी
अक्सर तब्दील हो जाती है
लुआठी में
फूंकने लगते हैं भाग्यविधाता
हर आदमी का सपना
हर प्रान्त की आशा
लहक उठती है आग
जलने लगता है
पूरा देश।

तब दिखाते हैं
भाग्यविधाता
फूलझड़ी का तमाशा।

दरअसल
सत्ता अब सर्कस है
जहां पहुंच सकता है
वही तमाशबीन
जो जानता हो
फूलझड़ी को लुआठी
और
लुआठी को फूलझड़ी में
तब्दील करने का गुर।

कविता

अपने पसीने से
धरती को सींचते किसान
अपने हथौड़े से
भविष्य को
शक्ल देते मज़दूर
हाथ रिक्शा से
बैल की तरह नधे रिक्शावाले
या
किसी भी मेहनतकश
आम आदमी से
मै जब-जब
करता हूं संवाद
बन जाती है एक कविता।

मुझे
किसान की खुरपी में
दिखती है
एक सुंदर कविता
हथौड़ा चलाते हाथ
हर चोट के साथ
रचते हैं नया गीत
रिक्शा खींचते
खुरदरे व्यक्ति की पगध्वनि से
फूटती है एक लंबी कविता।

मुझे
जब भी
पाना होता है संग
कविता का
मै
बतियाता हूं
इन मेहनतकश ईमानदार लोगों से
मैंने यहीं देखा है
आदमी को कविता
और
कविता को आदमी
में तब्दील होते।

कविता
अपने पसीने से
धरती को सींचते किसान
अपने हथौड़े से
भविष्य को
शक्ल देते मज़दूर
हाथ रिक्शा से
बैल की तरह नधे रिक्शावाले
या
किसी भी मेहनतकश
आम आदमी से
मै जब-जब
करता हूं संवाद
बन जाती है एक कविता।

मुझे
किसान की खुरपी में
दिखती है
एक सुंदर कविता
हथौड़ा चलाते हाथ
हर चोट के साथ
रचते हैं नया गीत
रिक्शा खींचते
खुरदरे व्यक्ति की पगध्वनि से
फूटती है एक लंबी कविता।

मुझे
जब भी
पाना होता है संग
कविता का
मै
बतियाता हूं
इन मेहनतकश ईमानदार लोगों से
मैंने यहीं देखा है
आदमी को कविता
और
कविता को आदमी
में तब्दील होते।

भूख

अगर
आदमी भूखा हो
तो चांद की
शीतल रोशनी से भी
झुलस सकता है
उसका बदन।
अगर
पेट भरा हो
तो परास्त कर सकता है
वही आदमी
धधकते सूरज को।

शहर की मौत

ठहरे हुए शहर में
गंतव्य की ओर
भागते लोग
दरअसल
शहर की
सड़करूपी धमनियों में
खून सदृश हैं
जिनके रूकने का
अर्थ है
शहर की मौत।

पेट की आग से नहीं फैलता प्रदूषण

जी हां!
आप कह सकते हैं
इस बस्ती में
कोई प्रदूषण नहीं
कम से कम
धुंआजनित प्रदूषण तो
एकदम नहीं।

आप ठोंक सकते हैं
अपनी पीठ
कर सकते हैं दावा कि
आपके अभियान से
जागरूक हो गये हैं बस्तीवासी
और
अब वे
पर्यावरण के दुश्मन
नहीं रहे।

आप जारी कर सकते हैं
प्रेस विज्ञप्तियां
छपवा सकते हैं
अपनी प्रशस्ति में
कई-कई पंक्तियां
पा सकते हैं
ढेर सारे पुरस्कार।

हालांकि
आप जानते हैं कि
इस बस्ती में
कई दिनों से
नहीं जला
किसी घर में चूल्हा।
चूल्हे की आग से
पर्यावरण को
होता है नुकसान
लेकिन
पेट की आग में
नहीं होता धुंआ।

इसलिए
उससे किसी को
कोई खतरा नहीं
न पर्यावरण को
न पुरस्कार को।

आप सब जानते हैं
लेकिन चुप हैं।
पर्यावरण की सुरक्षा के लिए
चुप रहना भी बेहद ज़रूरी है।

संस्कार

अपने बच्चों को
धर्मभीरु बना रहे हैं हम।

हम उन्हें बता रहे हैं
क्या होता है ईश्वर
कैसे की जाती है
उसकी आराधना
पूजा अर्चना में
कितनी अहमियत है
पंडित-पुरोहितों की।

उन्हें यह भी
बताया जा रहा है कि
क्यों डरना ज़रूरी है
ईश्वर से
उसके एजेंटों से।

एक बच्चे को
संस्कारवान बनाने के लिए
ज़रूरी है
यह सब बताना
सीखाना
धर्म के नाम पर डराना।

अपने बच्चों को
धर्मभीरू बना रहे हैं हम
भविष्य में
अपने इस्तेमाल के लिए।

दिनचर्या

पूरे होने की आस में
दम तोड़ चुके
अपने सपनों की
लाशों तले दबी
क्षुब्ध बीवी
सुबह झिड़कती है
देर से उठने पर।
कोसती है मां
समय से दवा नहीं ला पाने के लिए
बात नहीं करते बाबूजी
उनकी शिकायत है कि
अब वह उनकी उपेक्षा करता है
भन्नाता है बेटा
उसकी मनपसंद जिंस
नहीं खरीदी जा सकी।

कट जाती है
इसी तरह सुबह
और अन्तत:
वह निकलता है
दफ्तर के लिए
लाख कोशिश करे
लेकिन देर होनी है
देर होती है
फिर टेन पकड़ने के लिए
दौड़ता है वह
तेज! तेज !!
और तेज !!!

जब वह
सवार होता है
टेन पर
उसकी आंखें
बाहर उबल आने को होती है
और वह
हांफ रहा होता है
किसी निरीह जानवर की तरह।

टेन चलती है
हर स्टेशन पर
सवार होता है
हांफता हुआ जन सैलाब
देखते-देखते
तब्दील हो जाता है आदमी
भेंड़-बकरियों में
फिर किसी चमगादड़ सा
बस में लटक कर
वह पहुंचता है दफ्तर

और ठीक इसी तरह
घर लौटता है वह
थका-मांदा
जहां हर सदस्य
व्यंग्य वाणों के साथ
तैयार मिलता है
उसके स्वागत के लिए।

विषयवस्तु में प्रकाशित

नया सूरज

डूबते सूरज के
मलिन मुख पर
छाई उदासी
उतनी ही तेजी से
पसरती है
जितनी तेजी से
फैलता है
उगते सूरज के चेहरे पर
थिरकता उल्लास।

सूरज की उदासी
पसर जाती है
मन में बहुत गहरे तक
मस्जिद में पढ़ी जाती है नमाज
मंदिर में बजने लगते हैं घंटे
लेकिन
डूबता जाता है सूरज
बढ़ता जाता है अंधेरा।

घुप्प अंधेरे में
डूब जाता है
शहर का
एक बहुत बड़ा हिस्सा

जगमगा उठती है
एकछोटे से हिस्से में
रंग-बिरंगी रोशनी

कुछ लोग
व्यस्त हो जाते हैं
मस्त हो जाते हैं
जीवन की रंगीनियों में
जितना गहराता है अंधेरा
उतना ही बढ़ता है
उनकी दुनिया का उजाला
उतने ही उच्छृंखल
होते जाते हैं
बनावटी रोशनी में
जीने वाले
वे बनावटी लोग
जिन्होंने
कभी देखा ही नहीं
उगते सूरज को।

लेकिन
घुप्प अंधेरे में सहमी
एक बड़ी आबादी
करती है इंतजार
सूरज के उगने का

उन्हें पता है
सूरज का डूबना ही अन्त नहीं
इसलिए
इंतजार है उन्हें
सूरज के उगने का।

एक पागल कुत्ते की मौत

खून
जब काला पड़ जाता है
तो
मन में पसरे अंधेरे को
और स्याह कर देता है।
भले ही वह खून
उस कुत्ते के
मुंह से ही
क्यों न निकला हो
जिसे पागल क़रार दिया गया था।

पहले
वह पागल नहीं था
स्वस्थ, सुंदर, सजग और
चमकीली आंखों वाला
एक आज्ञाकारी
कुत्ता था वह।

कितनी सुंदर थी
उसकी दुम
जब वह हिलती थी
तो
उसे चाहने वालों को
गुदगुदी होती थी
लेकिन
इस सुंदर दुम के कारण ही
बेचारा
अन्तत:
मारा गया।
किसी की नज़र लग गई
और
कड़ी हो गई दुम
अब वह हिलती नहीं थी
चुभतीथी।

अब वह
कुकियाता नहीं
गुर्राता था।
हर अन्याय पर
भौंकता था
और
फिर तो हद हो गई
वह काटने लगा।

उसके नुकीले, धारदार
दांतों से लहूलुहान
सभ्य समाज ने
अन्तत:
उसे पागल करार दिया
और
एक दिन
प्रबल जनसमर्थन के बीच
पीट-पीट कर
मार डाला गया उसे।

रेलवे प्लेटफॉर्म पर ज़िंदगी

(एक)
वह दस साल का बच्चा नहीं
एक तपस्वी है
नंग-धड़ंग
जो
न ठंड से कांपता है
न ही गर्मी से हांफता है।
उसने
पूरी तरह
साध लिया है मौसम को।
प्लेटफ़ॉर्म पर ज़िंदगी
मानो तपस्या
दुर्गम गुफाओं में।

(दो)
लोमड़ी सी धूर्तता
कौवे सी सजगता
चील सी पैनी दृष्टि
गैंडे सी चमड़ी
भूख को काबू में रखने की क्षमता
यदि कम से कम
न हो इतना भी
तो मुश्किल है
प्लेटफॉर्म पर
एक दिन भी टिक पाना
इतना आसान नहीं
प्लेटफॉर्म पर
जीवन गुजार लेना।

(तीन)
सबकुछ बिकता है यहां
बादाम, चाय, अंडा,
किताब, अख़बार,
कॉफ़ी, पानी और न जाने क्या-क्या
लेकिन
सबसे सस्ता है
मैले-कुचैले कपड़ों में लिपटी
ज़िंदगी के प्रति ठंडी लड़कियों का
गर्म गोश्त
रात बारह बजे के बाद
लड़कियों की मंडी में
तब्दील हो जाता है प्लेटफॉर्म।

(चार)
अंतिम टेन के गुजरते ही
अपना असली चरित्र
दिखाती है ख़ाकी-काली वर्दी
लम्बे-लम्बे नुकीले दांत
उग आते हैं
आला अधिकारियों के
लार टपकाते मुंह में
लूट-खसोट-हिंसा-बलात्कार
कुछ भी वर्जित नहीं रहता फिर
और मुश्किल हो जाता है
फ़र्क करना
अपराध और कानून में।
दरअसल
रात बारह बजे के बाद
हमाम में तब्दील हो जाता है प्लेटफॉर्म
जहां
नंगे होते हैं सब।

जनसत्ता सबरंग में 3.10.99 को प्रकाशित

उन्माद

विचित्र बस्ती
अजूबे लोग
फूले हुए सीने
पिचके हुए पेट
रह-रह कर शोर मचाते
उछलते-कूदते
मानो पूरी हो गई हो
वर्षों पुरानी कोई मुराद।

बहुत डरावनी लगती है मुझे
यह बस्ती
इस बस्ती के लोग।

मैं पूछता हूं--
भाई !
क्यों पिचके हुए हैं
तुम्हारे पेट?
क्या तुम्हें कई दिनों से
खाना नसीब नहीं हुआ?

कोई जवाब नहीं देता
बढ़ जाता है शोर
तेज हो जाती है उछल-कूद
जश्न के इस माहौल में
मानो मेरा प्रश्न
पहुंचता ही नहीं
किसी कान तक।

मैं फिर पूंछता हूं--
भाई !
क्यों फूले हुए हैं
तुम्हारे सीने?
क्या तुम्हें
कोई बीमारी है?

अचानक थम जाता है शोर
एक साथ कई आंखें
उठती हैं मेरी ओर
बेवकूफ!
बीमारी नहीं
गर्व से फूला है
हमारा सीना।

क्या तुम्हें पता नहीं
अपना देश बन गया है
परमाणु शक्ति सम्पन्न देश।

मैं पूछता हूं
भाई!
कब बनेंगे हम
रोटी सम्पन्न राष्ट?

अचानक शोर उठता है
राष्टद्रोही! राष्टद्रोही!!


असुविधा में प्रकाशितउन्माद
विचित्र बस्ती
अजूबे लोग
फूले हुए सीने
पिचके हुए पेट
रह-रह कर शोर मचाते
उछलते-कूदते
मानो पूरी हो गई हो
वर्षों पुरानी कोई मुराद।

बहुत डरावनी लगती है मुझे
यह बस्ती
इस बस्ती के लोग।

मैं पूछता हूं--
भाई !
क्यों पिचके हुए हैं
तुम्हारे पेट?
क्या तुम्हें कई दिनों से
खाना नसीब नहीं हुआ?

कोई जवाब नहीं देता
बढ़ जाता है शोर
तेज हो जाती है उछल-कूद
जश्न के इस माहौल में
मानो मेरा प्रश्न
पहुंचता ही नहीं
किसी कान तक।

मैं फिर पूंछता हूं--
भाई !
क्यों फूले हुए हैं
तुम्हारे सीने?
क्या तुम्हें
कोई बीमारी है?

अचानक थम जाता है शोर
एक साथ कई आंखें
उठती हैं मेरी ओर
बेवकूफ!
बीमारी नहीं
गर्व से फूला है
हमारा सीना।

क्या तुम्हें पता नहीं
अपना देश बन गया है
परमाणु शक्ति सम्पन्न देश।

मैं पूछता हूं
भाई!
कब बनेंगे हम
रोटी सम्पन्न राष्ट?

अचानक शोर उठता है
राष्टद्रोही! राष्टद्रोही!!


असुविधा में प्रकाशितउन्माद
विचित्र बस्ती
अजूबे लोग
फूले हुए सीने
पिचके हुए पेट
रह-रह कर शोर मचाते
उछलते-कूदते
मानो पूरी हो गई हो
वर्षों पुरानी कोई मुराद।

बहुत डरावनी लगती है मुझे
यह बस्ती
इस बस्ती के लोग।

मैं पूछता हूं--
भाई !
क्यों पिचके हुए हैं
तुम्हारे पेट?
क्या तुम्हें कई दिनों से
खाना नसीब नहीं हुआ?

कोई जवाब नहीं देता
बढ़ जाता है शोर
तेज हो जाती है उछल-कूद
जश्न के इस माहौल में
मानो मेरा प्रश्न
पहुंचता ही नहीं
किसी कान तक।

मैं फिर पूंछता हूं--
भाई !
क्यों फूले हुए हैं
तुम्हारे सीने?
क्या तुम्हें
कोई बीमारी है?

अचानक थम जाता है शोर
एक साथ कई आंखें
उठती हैं मेरी ओर
बेवकूफ!
बीमारी नहीं
गर्व से फूला है
हमारा सीना।

क्या तुम्हें पता नहीं
अपना देश बन गया है
परमाणु शक्ति सम्पन्न देश।

मैं पूछता हूं
भाई!
कब बनेंगे हम
रोटी सम्पन्न राष्ट?

अचानक शोर उठता है
राष्टद्रोही! राष्टद्रोही!!


असुविधा में प्रकाशितउन्माद
विचित्र बस्ती
अजूबे लोग
फूले हुए सीने
पिचके हुए पेट
रह-रह कर शोर मचाते
उछलते-कूदते
मानो पूरी हो गई हो
वर्षों पुरानी कोई मुराद।

बहुत डरावनी लगती है मुझे
यह बस्ती
इस बस्ती के लोग।

मैं पूछता हूं--
भाई !
क्यों पिचके हुए हैं
तुम्हारे पेट?
क्या तुम्हें कई दिनों से
खाना नसीब नहीं हुआ?

कोई जवाब नहीं देता
बढ़ जाता है शोर
तेज हो जाती है उछल-कूद
जश्न के इस माहौल में
मानो मेरा प्रश्न
पहुंचता ही नहीं
किसी कान तक।

मैं फिर पूंछता हूं--
भाई !
क्यों फूले हुए हैं
तुम्हारे सीने?
क्या तुम्हें
कोई बीमारी है?

अचानक थम जाता है शोर
एक साथ कई आंखें
उठती हैं मेरी ओर
बेवकूफ!
बीमारी नहीं
गर्व से फूला है
हमारा सीना।

क्या तुम्हें पता नहीं
अपना देश बन गया है
परमाणु शक्ति सम्पन्न देश।

मैं पूछता हूं
भाई!
कब बनेंगे हम
रोटी सम्पन्न राष्ट?

अचानक शोर उठता है
राष्टद्रोही! राष्टद्रोही!!


असुविधा में प्रकाशित

फफोले

भूख कीआग में
बरसों जला हूं मैं
फिर तुम मुझे
उतप्त शब्दों के वाण से
क्या डराओगे?

मेरे शरीर के
हर फफोले में
समाहित है
रोटी जनित आंदोलनों का इतिहास
और तुम
मुझे
आंदोलन की परिभाषा बताओगे?

मेरी भूख ने
संतोष कर लिया है
पर फफोले में कुलबुलाते
उन कीड़ों का क्या करूं
जो
आज भी चीख रहे हैं
रोटी!रोटी !! रोटी !!!
क्या तुम
उपदेश के बजाय
इन्हें रोटी
दे सकोगे?

गंध और आज की कविताए में प्रकाशित

चुप्पी

ऐ लड़की!
तू हमेशा चुप क्यों रहती है?
तू कुछ बोलती
क्यों नहीं?

ऐ लड़की!
तू बोल
तू बोल कि थर्रा उठे
तुझे चीज़ समझने वाली
यह जड़ व्यवस्था।

तू बोल कि
कांप उठे
तुझे रोशनी से
वंचित करने वाला
युग का अंधेरा।

लड़की!
तू कुछ बोल
क्योंकि तेरा
बोलना बेहद ज़रूरी है।

तेर चुप रहने से ही
ज़हर बढ़ा है
उन कुहनियों का
जो भरे बाज़ार में,
बस, टेन या
किसी भी भीड़ में
बड़ी ही चालाकी से
डंक मारती हैं तुझे।
कि
तेरे चुप रहने से ही
धूर्त बन गया है
पूरा समाज
और तेरे कल्याण के
नाम पर
रोज गढ़ता है
एक नारा।

तू बोल!
कि तेरा बोलना ही
माकूल जवाब होगा
उन नारों का
जो तुझे
गूंगी बनाकर
रखना चाहते हैं।

उदगार में प्रकाशित

हर चेहरे पर एक कविता

बहुत कुछ अनकहा
बहुत कुछ अनसुना
लेकिन
क्या सब कहना ज़रूरी है ?
सब सुनना ज़रूरी है?

रेस के घोड़ों की तरह
सरपट भागती ज़िंदगी में
चेहरे बहुत कुछ
कहते हैं
समय के थपेड़ों की झुर्रियां
खंडित करना चाहती हैं
चेहरे और
आंखों के बीच के
संवाद को
लेकिन
झुर्रियां
कब खंडित कर पाई हैं
उस कविता को
जो चेहरे पर लिखी है?

कहने-सुनने की
कोई ज़रूरत नहीं
मैं
पढ़ लूंगा
समझ लूंगा
हर चेहरे को
क्योंकि
हर चेहरे पर
एक कविता जोलिखी है।

उदगार में प्रकाशितहर चेहरे पर एक कविता
बहुत कुछ अनकहा
बहुत कुछ अनसुना
लेकिन
क्या सब कहना ज़रूरी है ?
सब सुनना ज़रूरी है?

रेस के घोड़ों की तरह
सरपट भागती ज़िंदगी में
चेहरे बहुत कुछ
कहते हैं
समय के थपेड़ों की झुर्रियां
खंडित करना चाहती हैं
चेहरे और
आंखों के बीच के
संवाद को
लेकिन
झुर्रियां
कब खंडित कर पाई हैं
उस कविता को
जो चेहरे पर लिखी है?

कहने-सुनने की
कोई ज़रूरत नहीं
मैं
पढ़ लूंगा
समझ लूंगा
हर चेहरे को
क्योंकि
हर चेहरे पर
एक कविता जोलिखी है।

उदगार में प्रकाशितहर चेहरे पर एक कविता
बहुत कुछ अनकहा
बहुत कुछ अनसुना
लेकिन
क्या सब कहना ज़रूरी है ?
सब सुनना ज़रूरी है?

रेस के घोड़ों की तरह
सरपट भागती ज़िंदगी में
चेहरे बहुत कुछ
कहते हैं
समय के थपेड़ों की झुर्रियां
खंडित करना चाहती हैं
चेहरे और
आंखों के बीच के
संवाद को
लेकिन
झुर्रियां
कब खंडित कर पाई हैं
उस कविता को
जो चेहरे पर लिखी है?

कहने-सुनने की
कोई ज़रूरत नहीं
मैं
पढ़ लूंगा
समझ लूंगा
हर चेहरे को
क्योंकि
हर चेहरे पर
एक कविता जोलिखी है।

उदगार में प्रकाशितहर चेहरे पर एक कविता
बहुत कुछ अनकहा
बहुत कुछ अनसुना
लेकिन
क्या सब कहना ज़रूरी है ?
सब सुनना ज़रूरी है?

रेस के घोड़ों की तरह
सरपट भागती ज़िंदगी में
चेहरे बहुत कुछ
कहते हैं
समय के थपेड़ों की झुर्रियां
खंडित करना चाहती हैं
चेहरे और
आंखों के बीच के
संवाद को
लेकिन
झुर्रियां
कब खंडित कर पाई हैं
उस कविता को
जो चेहरे पर लिखी है?

कहने-सुनने की
कोई ज़रूरत नहीं
मैं
पढ़ लूंगा
समझ लूंगा
हर चेहरे को
क्योंकि
हर चेहरे पर
एक कविता जोलिखी है।

उदगार में प्रकाशित

डर गये हैं जंगल

जंगल डर गये हैं
और भयभीत जंगल पर
ढा रहा है क़हर
उसकी ओर बढ़ता शहर।

खतरे में है
जंगल का अस्तित्व
शहर के
खून से सने
गंदे हाथ
नोंचते-खसोटते हैं उसे
और हर रोज
ख़त्म हो जाता है
एक जंगल।

अपना तन काटकर
शहर के लिए
जगह बनाने वाले
जंगल पर
शहर का आरोप है कि
वह सभ्य नहीं हुआ
अभी बहुत जंगलीपन शेष है उसमें
इसलिए ज़रूरी है
उसका संहार।

जंगल पूछता है--
कौन ज्यादा खतरनाक है
उसका जंगलीपन
जिसने अपना तन काटकर
शहर को पैदा किया
या
शहर की सभ्यता
जो कर रही है
अपनी जननी का ही विनाश?
उदगार में प्रकाशितडर गये हैं जंगल

जंगल डर गये हैं
और भयभीत जंगल पर
ढा रहा है क़हर
उसकी ओर बढ़ता शहर।

खतरे में है
जंगल का अस्तित्व
शहर के
खून से सने
गंदे हाथ
नोंचते-खसोटते हैं उसे
और हर रोज
ख़त्म हो जाता है
एक जंगल।

अपना तन काटकर
शहर के लिए
जगह बनाने वाले
जंगल पर
शहर का आरोप है कि
वह सभ्य नहीं हुआ
अभी बहुत जंगलीपन शेष है उसमें
इसलिए ज़रूरी है
उसका संहार।

जंगल पूछता है--
कौन ज्यादा खतरनाक है
उसका जंगलीपन
जिसने अपना तन काटकर
शहर को पैदा किया
या
शहर की सभ्यता
जो कर रही है
अपनी जननी का ही विनाश?
उदगार में प्रकाशितडर गये हैं जंगल

जंगल डर गये हैं
और भयभीत जंगल पर
ढा रहा है क़हर
उसकी ओर बढ़ता शहर।

खतरे में है
जंगल का अस्तित्व
शहर के
खून से सने
गंदे हाथ
नोंचते-खसोटते हैं उसे
और हर रोज
ख़त्म हो जाता है
एक जंगल।

अपना तन काटकर
शहर के लिए
जगह बनाने वाले
जंगल पर
शहर का आरोप है कि
वह सभ्य नहीं हुआ
अभी बहुत जंगलीपन शेष है उसमें
इसलिए ज़रूरी है
उसका संहार।

जंगल पूछता है--
कौन ज्यादा खतरनाक है
उसका जंगलीपन
जिसने अपना तन काटकर
शहर को पैदा किया
या
शहर की सभ्यता
जो कर रही है
अपनी जननी का ही विनाश?
उदगार में प्रकाशितडर गये हैं जंगल

जंगल डर गये हैं
और भयभीत जंगल पर
ढा रहा है क़हर
उसकी ओर बढ़ता शहर।

खतरे में है
जंगल का अस्तित्व
शहर के
खून से सने
गंदे हाथ
नोंचते-खसोटते हैं उसे
और हर रोज
ख़त्म हो जाता है
एक जंगल।

अपना तन काटकर
शहर के लिए
जगह बनाने वाले
जंगल पर
शहर का आरोप है कि
वह सभ्य नहीं हुआ
अभी बहुत जंगलीपन शेष है उसमें
इसलिए ज़रूरी है
उसका संहार।

जंगल पूछता है--
कौन ज्यादा खतरनाक है
उसका जंगलीपन
जिसने अपना तन काटकर
शहर को पैदा किया
या
शहर की सभ्यता
जो कर रही है
अपनी जननी का ही विनाश?

उदगार में प्रकाशित

हादसा

मैं
रोज सुबह
कोशिश करता हूं
अख़बार के पन्नों में
एक मुकम्मिल अख़बार
ढूंढने की
लेकिन
हर बार
मुझे मिलता है
खून से लथपथ
एक निकम्मा तंत्र
जिसका
हरेक पुर्जा बिकाऊ है।

मैं
समझ नहीं पाता कि
हादसा किसे कहूं
तंत्र के जाहिल और भ्रष्ट हो जाने को
या
एक मुकम्मिल अख़बार के
ऐसे ही एक तंत्र में
तब्दील हो जाने को?

उदगार में

श्रमजीवी

चींटियों का
अपना कोई धर्म नहीं होता
इसलिए
आसान है
उन्हें कुचल देना।

कतारबध्द चींटियां
सिर्फ मेहनत करना जानती हैं
दिन-रात
चौबीसों घंटे
बस काम और काम।
उन्हें फुरसत ही नहीं
धर्मं के बारे में
सोचने की
न वे मस्जिद तोड़ना जानती हैं
न मंदिर बनाना
लेकिन
जब-जब टूटी हैं मस्जिदें
जब-जब गिराये गये हैं मंदिर
कुचली गईं हैं चींटियां
कतारबध्द
मेहनतकश चींटियां।


उदगार में प्रकाशित

शहर की चिठ्ठी गांव के नाम

मां!
तुम्हारा ख़त मिला
मैं जानता था
तुम चिंतित होगी
मेरे लिए
लेकिन चिंता की
कोई बात नहीं
यहां सब ठीक है।

मेरी नौकरी
छूट गई है
कारखाने की चिमनी
अब धुआं नहीं
नारे उगल रही है
लेकिन चिंता की
कोई बात नहीं
मैं मज़दूरी कर रहा हूं
कमा रहा हूं, मस्त हूं।

आंदोलन
जोरों से चल रहा है
मज़दूर
रोज जोश में आते हैं
और
पुलिस के डंडे खाकर
ठंडे पड़ जाते हैं
लेकिन
तुम फिक्र मत करना
मैं दूर ही रहता हूं
इन झमेलों से।

मां !
अब यहां
फुटपाथ पर रहने के लिए भी
मार होती है
इसलिए
कई-कई रात
आंखों में ही गुजारनी पड़ती है
उन रातों को
बहुत याद आता है
तुम्हारा फटा आंचल
जिसमें छिपकर
निश्चिंत हो जाता था
मेरा बचपन
फिर भी
चिंता की कोई बात नहीं।

मां!
यहां की हवा में
तैर रहा है ज़हर
पानी पीने लायक नहीं रहा
अस्पतालों में
कतारों में खड़े मरीज़
इलाज से पहले ही
दम तोड़ रहे हैं
फिर भी
मैं ठीक हूं
चिंता की कोई
बात नहीं है।

वैसे सच तो यह है मां
कि
शहर
अब आदमी के रहने लायक नहीं रहा
सोचता हूं
गांव वापस लौट आऊं।

स्वातिपथ में प्रकाशितशहर की चिठ्ठी गांव के नाम
मां!
तुम्हारा ख़त मिला
मैं जानता था
तुम चिंतित होगी
मेरे लिए
लेकिन चिंता की
कोई बात नहीं
यहां सब ठीक है।

मेरी नौकरी
छूट गई है
कारखाने की चिमनी
अब धुआं नहीं
नारे उगल रही है
लेकिन चिंता की
कोई बात नहीं
मैं मज़दूरी कर रहा हूं
कमा रहा हूं, मस्त हूं।

आंदोलन
जोरों से चल रहा है
मज़दूर
रोज जोश में आते हैं
और
पुलिस के डंडे खाकर
ठंडे पड़ जाते हैं
लेकिन
तुम फिक्र मत करना
मैं दूर ही रहता हूं
इन झमेलों से।

मां !
अब यहां
फुटपाथ पर रहने के लिए भी
मार होती है
इसलिए
कई-कई रात
आंखों में ही गुजारनी पड़ती है
उन रातों को
बहुत याद आता है
तुम्हारा फटा आंचल
जिसमें छिपकर
निश्चिंत हो जाता था
मेरा बचपन
फिर भी
चिंता की कोई बात नहीं।

मां!
यहां की हवा में
तैर रहा है ज़हर
पानी पीने लायक नहीं रहा
अस्पतालों में
कतारों में खड़े मरीज़
इलाज से पहले ही
दम तोड़ रहे हैं
फिर भी
मैं ठीक हूं
चिंता की कोई
बात नहीं है।

वैसे सच तो यह है मां
कि
शहर
अब आदमी के रहने लायक नहीं रहा
सोचता हूं
गांव वापस लौट आऊं।

स्वातिपथ में प्रकाशितशहर की चिठ्ठी गांव के नाम
मां!
तुम्हारा ख़त मिला
मैं जानता था
तुम चिंतित होगी
मेरे लिए
लेकिन चिंता की
कोई बात नहीं
यहां सब ठीक है।

मेरी नौकरी
छूट गई है
कारखाने की चिमनी
अब धुआं नहीं
नारे उगल रही है
लेकिन चिंता की
कोई बात नहीं
मैं मज़दूरी कर रहा हूं
कमा रहा हूं, मस्त हूं।

आंदोलन
जोरों से चल रहा है
मज़दूर
रोज जोश में आते हैं
और
पुलिस के डंडे खाकर
ठंडे पड़ जाते हैं
लेकिन
तुम फिक्र मत करना
मैं दूर ही रहता हूं
इन झमेलों से।

मां !
अब यह