डूबते सूरज के
मलिन मुख पर
छाई उदासी
उतनी ही तेजी से
पसरती है
जितनी तेजी से
फैलता है
उगते सूरज के चेहरे पर
थिरकता उल्लास।
सूरज की उदासी
पसर जाती है
मन में बहुत गहरे तक
मस्जिद में पढ़ी जाती है नमाज
मंदिर में बजने लगते हैं घंटे
लेकिन
डूबता जाता है सूरज
बढ़ता जाता है अंधेरा।
घुप्प अंधेरे में
डूब जाता है
शहर का
एक बहुत बड़ा हिस्सा
जगमगा उठती है
एकछोटे से हिस्से में
रंग-बिरंगी रोशनी
कुछ लोग
व्यस्त हो जाते हैं
मस्त हो जाते हैं
जीवन की रंगीनियों में
जितना गहराता है अंधेरा
उतना ही बढ़ता है
उनकी दुनिया का उजाला
उतने ही उच्छृंखल
होते जाते हैं
बनावटी रोशनी में
जीने वाले
वे बनावटी लोग
जिन्होंने
कभी देखा ही नहीं
उगते सूरज को।
लेकिन
घुप्प अंधेरे में सहमी
एक बड़ी आबादी
करती है इंतजार
सूरज के उगने का
उन्हें पता है
सूरज का डूबना ही
अन्त नहीं
इसलिए
इंतजार है उन्हें
सूरज के उगने का।
Thursday, November 29, 2007
नया सूरज
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कविताएं
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2 comments:
घुप्प अंधेरे में सहमी
एक बड़ी आबादी
करती है इंतजार
सूरज के उगने का
असल में यही आबादी दुनिया में जीवन की मुख्य धारा है. अच्छी कविता के लिए बधाई.
यही आम आदमी के जीवन का चक्र हैं. शाम होती ही छिपते हुए सूरज के साथ कुछ अधूरे सपने लिए वो घर लौटता हैं लेकिन अगली सुबह फिर नई उमंग और तरंग के साथ अपने अधूरे खवाब को साकार करने के लिए जुट जाता हैं. दिल को स्पर्श करती इस कविता की रचना के लिए बधाई
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