पंकज कौरव की कविता
युवा पत्रकार पं
कज कौरव का अंदाज-ए-बयां अलग है। नई ऊर्जा, नई सोच, नई संवेदनाओं से लबरेज पंकज की बेचैनी उन्हें कलम उठाने को मजबूर करती है और फिर कविता खुद ब खुद निकल आती है। कलम के साथ-साथ टेलीविजन की तकनीक में माहिर पंकज की एक कविता ख़ास आपके लिए। आशा है आपको पसंद आएंगी।
पुनरावृत्ति
मैं नहीं जानता
कि मां की कोख मुझे कितनी प्यारी थी
मैं नहीं जानता
कि क्यों रोता रहा था मैं
पैदा होने के बाद भी
अपनी मां की प्रसव पीड़ा को...
मैं नहीं जानता कि
कैसे पहचान लेता था
मैं अपनी मां की गोद...
फिर मैं जानने लगा था
चिड़ियों की चहक,
फूलों की महक,
हवा की सरसराहट,
तितलियों के पंख और
इंद्रधनुष के रंग...
लेकिन बहुत जानने के बाद
अब मैं फिर नहीं जानता कि
क्यों छोटी होती जा रही है
मेरे लिए मां की गोद...
शायद मैं लौट रहा हूं
अपने शैशव में..
जहां मुझे फिर से जरूरत है
एक गोद की...
एक कोख की...
और अंतत: एक प्रसव की...
जो जन्मेगा मुझे फिर एक बार...
Sunday, August 26, 2007
मैं लौट रहा हूं अपने शैशव में
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मेहमान का पन्ना
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3 comments:
एकदम अनूठी कविता है । बहुत पसन्द आई ।
घुघूती बासूती
बहुत सुन्दर रचना है।
सुंदर !
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