सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के ब्लॉग पर आपका स्वागत है। ऐसे ही आते रहिए, अच्छा लगता है

 

 

Friday, August 17, 2007

होश उड़ाने वाला सर्कुलर

मेरे बेटे के स्कूल से एक सर्कुलर आया है। सर्कुलर पढ़ा तो होश उड़ गए। इससे पहले कि आगे बढ़ूं आप भी वो सर्कुलर पढ़ लीजिए--
The School is proposing to organize and international tour to Europe for students of Class V onwards. The tentative dates are March 15-March 22, 2008. The cost of the 7-day tour is approximately Rs. 1 lakh. If you wish to send your ward, kindly inform the teacher through a written note as the final modalities need to be worked out.

गनीमत ये रही कि ये हमारे wish पर छोड़ दिया गया। पता नहीं कहीं भविष्य में अनिवार्य ही न कर दे। बेटे की ओर देखा तो उसके चेहरे से ही लग गया कि मेरा जवाब क्या होगा। हालांकि यूरोप उसे अपनी ओर खींच रहा है। हाल ही टीवी पर दिलवाले दुल्हनिया फिल्म देखी है उसने। उसमें भी काजोल और शाहरुख यूरोप टूर पर ही जाते हैं। सिनेमा को वो यूरोप उसे असली जिंदगी में लुभा रहे हैं। वो जानता है कि पिता की औकात नहीं है। बजट उसकी इच्छा पर भारी पड़ती है लेकिन बाल कल्पना। approximately 1 lakh लिखा हुआ है, इसलिए वो अपनी मां से कहता भी है कि अगर एक लाख से कम लगा तो। यानि बजट अनुमति देता तो वो जाहिर तौर पर जाता।
ये सिर्फ उसके मन की बात नहीं है। मैं समझ सकता हूं कि उसके जैसे तमाम बच्चों के मन में यही चल रहा होगा। ऐसे तमाम बच्चों के माता पिता सिर धुन रहे होंगे। कैसा स्कूल है? कैसी योजनाएं बनाता है? शायद हम ये भी कह सकते हैं कि अगर हम कंगले हैं तो इसमें स्कूल का क्या कसूर है? शायद ये भी सच हो। दो बच्चे पढ़ते हैं। हर तीसरे महीने 12 हजार रुपए फीस भरने के लिए जो जद्दोजहद मैं या मेरे जैसे पैरेंट्स करते होंगे- ये बताने की जरूरत नहीं है। मैं जिस स्कूल में पढ़ता था। वो सरकारी था। प्राइमरी स्कूल की बात कर रहा हूं। फीस तो बहुत कम या न के बराबर थी लेकिन हर शनिवार को गणेश की पूजा स्कूल में होती थी। इसके लिए दस पैसे देने पड़ते थे। हर हफ्ते दस पैसे। पैसे लेकर न जाओ तो गुरुजी डंडे तरेरते और घर वापस लौटा देते कि जाओ लेकर आओ। इस हम शनिचरा कहते थे। पूरे सनीच्चर थे इस मामले में अपने गुरुजी लेकिन सिर्फ शनिवार को।
लेकिन पब्लिक स्कूल तो इस मामले में हर रोज सनीच्चर हैं। मैं पांच साल से दिल्ली में हूं। अभी तक बच्चों को लालकिला नहीं घूमा पाया हूं। ओल्ड फोर्ट और चिड़ियाघर भी लिस्ट में है। दिल्ली टूर के लिए बेताब बेटे के दिल में अब यूरोप टूर का सपना है। अभी तक तो कुछ भी नहीं हुआ है लेकिन अगर स्कूल से एक बच्चा भी इसके लिए तैयार हो गया तो मुझे पता है कि मेरा बच्चा किस तरह हीन भावना से ग्रस्त हो जाएगा। मेरी समझ में नहीं आता कि इन पब्लिक स्कूलों में पढ़ाई की जगह उन चीजों को इतनी तवज्जों क्यों दी जाती है, जिसमें कारोबार का स्कोप हो। क्या शिक्षण संस्थान को पूरी तरह बाज़ार बन जाना चाहिए?

5 comments:

Isht Deo Sankrityaayan said...

चाहिए ? ये कैसी बुड्बकों जैसी बात करते हैं सतेन्द्र जी! अभी चाहने के लिए गुंजाइश बची रह गई है क्या कहीँ? टूर की तो बात छोडिए, नाच-गाने-सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम पर भी यही सब हो रहा है. अकेले आप ही नहीं हम और हमारे कई मित्र इस मुस्स्बत से दो-चार हो रहे हैं. बहाने सबके अलग-अलग हो सकते हैं, पर उद्देश्य सबका एक ही है, सूट-बूट पहन कर लूट. इनका विरोध करने के लिए हमें खड़ा होना होगा. अभिभावकों को इस बात के लिए तैयार होना होगा कि वे जुट कर विरोध करें इन स्कूलों का. झूठमूठ के स्टेटस क्वो के बुखार से उबर कर सरकारी स्कूलों की प्रासंगिकता को नए सिरे से जिंदा करना होगा. वैसे भी पढाई के मामले में ये उनसे बेहतर नहीं हैं. पता कर लीजिए, वहां भी गणित-विज्ञान में ट्यूशन एक तरह की अघोषित अनिवार्यता है और सरकारी स्कूलों में तो है ही. फिर केवल गितिर-पितिर अंगरेजी के लिए हम इनके आश्रित क्यों हों? वह उतना हम बाद में कोर्स भी करा सकते हैं. या क्या पता आने वाले दिनों में हिंदुस्तान इस हीन भावना से ही उबर जाए. आप क्या सोचते हैं इस बारे में, बताइएगा.

संजय तिवारी said...

हम सब एक भंवर में फंसे हैं. जहां या तो डूब जाएंगे या तो भंवर फेंककर व्यवस्था के किनारे पर रख देगा.
बच्चे में हीन भावना तो आयेगी ही क्योंकि हमने यूरोप-अमरीका का इतना महिमामण्डन जो कर रखा है. बहुत मुश्किल समय है.

mamta said...

अच्छा है जो हमारे बच्चे पढ़ कर स्कूल से निकल गए। इससे ये मत सोचिये की हमने ये सब नही भुगता है। उस समय पचास हजार माँगा जाता था।जब तब नही दे पाए थे तो भला अब कैसे दे पाते।

अब महंगाई जो बढ़ गयी है :)

हरिराम said...

अंग्रेजी स्कूलों में ऐसे कार्यों हेतु 1 लाख देनेवाले अभिभावकों की भी कमी नहीं है। अतः ये सफल होते हैं। देश प्रगति कर रहा है, यदि हम भी विदेशों के अनुकूल प्रगति कर पाते तो यह राशि भी सामान्य सी लगती। देश में हिन्दी स्कूलों की स्थिति बुरी होती जा रही है, जिसे हमें सुधारना है।

Udan Tashtari said...

यह तो बहुत चिंता का विषय है. कितने ही बच्चे हीन भावना और कुंठा ग्रसित हो जायेंगे इस तरह तो. आप लोगों को स्कूल प्रशासन से इस विषय में बात करना चाहिये. साथ ही बच्चों को भी मानसिक रुप से तैयार करें ताकि वो कोई हीन भावना न पालें एवं अपने न पाने को किसी नाकामी से न जोड़ कर देखें.

अफसोसजनक किन्तु यही सत्य है हर तरफ.