ये गांधीजी के बारे में शीला दीक्षित जैसी किसी नेता का भविष्य का बयान हो सकता है। एअरकंडीशंड, बेहतरीन ढंग से सजाए गए किसी मंत्री या नेता के कमरे में एक धोती में ही पूरे शरीर को ढंकने की कोशिश करने वाले अधनंगे आदमी की तस्वीर मैच नहीं करती न। होगा वो महापुरुष लेकिन आगे बढ़ना है तो फिर ये सब बर्दाश्त कैसे किया जा सकता है? जैसे दिल्ली में मर्सिडीज के साथ रिक्शा मैच नहीं करती। अब ऐसे में गांधी जी के बारे में कल कोई इस कदर बयान दे दे तो फिर हैरानी नहीं होनी चाहिए। हमें पहले से ही इसके लिए तैयार रहना चाहिए।
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने जब ये कहा कि दिल्ली की सड़कों पर रिक्शा अच्छी नहीं लगती तो जाहिर तौर पर उनके अंदर का आहत सौंदर्यबोध ये बातें कह रहा था। वो दिल्ली की मालकिन (क्या हुआ गर उनको मुख्य
मंत्री के पद तक पहुंचाने में गरीब रिक्शा वालों का वोट भी रहा हो) और उनकी दिल्ली इतनी बदसूरत। वो दिल्ली की मालकिन और उनकी दिल्ली में इतने गरीब। दिल्ली को अब सिर्फ मर्सिडीज चाहिए। नहीं चाहिए रिक्शा। नहीं चाहिए ऐसा कुछ भी, जो इसकी खूबसूरती को बिगाड़ता हो। नहीं चाहिए दिल्ली को गरीब। दिल्ली अब नहीं रहेगा दिलवालों की। इसे अब हर हाल में सिर्फ पैसे वालों की दिल्ली बननी है। दिल्ली मर्सिडीज वालों की।
इंदिरा गांधी ने नारा दिया था-गरीबी हटाओ। शीला घूमा फिराकर कह रही हैं--गरीबों को हटाओं। ये उनके उसी बयान का विस्तार है, जिसमें उन्होंने कहा था कि यूपी और बिहार से आने वाले लोगों के कारण दिल्ली पर बोझ बढ़ता जा रहा है। घूमाफिराकर एक ही बात लेकिन इसके लिए अकेले शीला दीक्षित को ही दोष क्यों दें? ज़माना तेज़ी से बदल रहा है। अब गरीबों की परवाह किसी को नहीं है। ठेले पर सब्जी बेचने वाले भी कलंक है। इसलिए अब मल्टीनेशनल और बड़ी कंपनियां सब्जियां बेचने लगी हैं। इलाके की किराना की दुकान में सामान कैसे ठुंसे हुए और बेतरतीब बिखरे रहते हैं, इसलिए अब जाइए मॉल में, खुद उठाइए अपनी पसंद की चीज़। ये अलग बात है कि वहां से निकलते वक्त आपकी तलाशी ऐसे ली जाएगी, मानो आप चोर हों लेकिन ये ही स्टेटस सिंबल है। हर चीज के लिए अब मॉल है। माल है तो मॉल में जाइए।
गरीब बेचारा तो घुसने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाएगा। दिल्ली का दिल झुग्गियों में धड़कता है लेकिन अब शीला को दिल नहीं चाहिए।
शीला ने तो अभी केवल बयान ही दिया है, कोलकाता में तो गरीबों का हमदर्द करने वाली सीपीएम ने रिक्शा को पहले ही बॉय-बॉय कह दिया है। सच है कि कोई आदमी हाथ से रिक्शा खींचे तो इससे बड़ी अमानवीय घटना और कुछ नहीं हो सकती लेकिन उनके लिए रोटी का वैकल्पिक इंतजाम किए बगैर रोजगार छीन लिया जाय तो क्या ये उससे बड़ी अमानवीय घटना नहीं है?
लेकिन नहीं, हमें रिक्शा नहीं चाहिए। हमें आगे बढ़ना है। अब गरीबी की बात नहीं होगी, अब गरीबों की बात होगी। हम गरीबों की कीमत पर आगे बढ़ेंगे। खूबसूरत दुनिया रचेंगे। जहां कोई रिक्शा नहीं होगी, कोई गरीबी नहीं होगी, कोई भुखमरी नहीं होगी, रोटी के लिए संघर्ष नहीं होगा क्योंकि उस दुनिया में गरीबों की एंट्री की इजाजत नहीं होगी। शायद शीला ऐसा ही सपना देख रही हैं। लेफ्ट वाले भी।
Monday, July 30, 2007
कौन है ये लंगोटधारी, हटाओ इसे
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7 comments:
आप सही कह रहे हैं. रिक्शा अगर हटाना भी है तो रिक्शेवाले को वैकल्पिक रोजगार मिलना ही चाहिये. तकनीक के विकास में क्या रहेगा, क्या नहीं - यह तो समय तय करेगा. पर आदमी को तो रहने की सम्मानजनक स्थितियाँ होनी ही चाहियें.
जिस तरह का आर्थिक विकास का क्रम आज जारी है उस सब में ये समस्याएं तो हमारे महानगरों को उठानी ही होंगीं पर उन गरीबों के लिये कुछ करने की बजाय उन्हीं को कोसें तो इससे अधिक शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता....
शर्मनाक है. बगैर वैकल्पिक व्यवस्था किये इस तरह के कदम कतई उचित नहीं. आपने फिर एक अच्छा मुद्दा उठाया है.
इंदिरा गांधी जब गरीबी हटाओ का नारा दे रही थीं, तब उनका मतलब भी वही था - गरीब हटाओ. फर्क बस इतना है कि वह जरा खुल कर नहीं कह पा रही थीं. उनके डैडी चोंचलिस्ट होने का नाटक जो कर गए थे, उसका थोडा दबाव था उनके ऊपर. यह आपने ठीक पहचाना है यह भी उसे ही विस्तार दे रहीं हैं. वह दिन दूर नहीं जब पूरे देश को सुन्दर बनाने के लिए देश भर के ग़रीबों को उठा कर समुद्र में फेंक देने की बात शुरू हो जाएगी.
मुख्यमंत्री को क्या पता गरीबो का दर्द। उसे यह भी नही मालूम की आम-आदमी कितना परेशान हो जाएगा उस के इस फैसले से। यह सरकार बूढे-लाचारों को जिन्हें इन रिक्शा वालों का ही सहारा है।वह अपने छोटे-छोटे सफर कैसे करेगें।और बह रिक्शेवाले अपने बच्चे कैसे पालेगें उसे इस की चिन्ता कहाँ है?पहले उन के लिए कोई इन्तजाम तो करें।आप ने बहुत सही मुद्दा उठाया है।
शीला दीक्षित को प्रतीक बनाकर दोष मढ़ देने से समस्या का सरलीकरण हो जाएगा. सरकार में जाने के बाद जनप्रतिनिधि जनविरोधी प्रतिनिधि हो जाता है इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन शीला को अकेले क्यों दोष दें. वे तो उस बड़े अभियान की एक कठपुतली हैं जिसे कारपोरेट जगत मिलजुल कर चला रहा है. कंपनीराज.
इस कंपनीराज का प्रभाव है जो टुकड़ों में हमें यहां वहां दिख रहा है. पहले गरीब बनाए फिर गरीबों को उसके आखिरी अवसर श्रम से मरहूम कर दिया. धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति बढ़ेंगी. अन्य शहरों तक फैलेगी. फिर हम भी चीन की तरह दुनिया को दिल्ली-बंबई दिखाएंगे और कहेंगे हम एक विकसित राष्ट्र हैं. हमारी जीडीपी इतना है और हमारे पास इतना मुद्रा भंडार है. लेकिन विकास का यह उजियारा कुछ चुनिंदा शहरों में सिमटा हुआ ही होगा.
बाकी देश को अंधेरा ही मिलेगा.
बंधुओ, कोरी टिप्पणियों से कोई फायदा नहीं। दिल्ली के कुछ क्षेत्रों में (विशेषकर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन अजमेरी गेट से खारी बावली फतेहपुरी तक) सबसे जल्दी पहँचानेवाली सवारी रिक्शा ही होती है।
दिल्ली में रिक्शा की बनावट में कई यान्त्रिक सुधार किए गए हैं। इसे हल्का बनाया गया है एल्यूमिनियम के पाइप तथा तारपोलीन की सीट लगाकर। गीयरवाला क्राँक लगाकर इसे तीव्रगति वाला वाहन बनाने का भी प्रयास किया गया है ताकि यह ओटो की बराबरी कर सके।
हालांकि एक्सप्रेस सड़कों पर तेज दौड़ते वाहनों के बीच जब कोई रेंगनेवाला रिक्शा आ जाता है तो ट्राफिक के लिए काफी समस्या पैदा हो जाती है। ऐसी सड़कों पर रिक्शा का प्रवेश वर्जित है।
लेकिन कुछ इलाकों में केवल रिक्शा को ही अनुमति मिलनी चाहिए, अन्य वाहनों का प्रवेश वर्जित होना चाहिए। ताकि प्रदूषण से तो मुक्ति मिले।
हाँ, शाली जी को रिक्शे की गति को तीव्र बनाने के लिए अनुसंधान कर्ता अभियन्ताओं को नए कारगर उपाय खोजने के लिए 10 लाख रुपये का पुरस्कार योजना की घोषणा करनी चाहिए।
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