मैं
रोज सुबह
कोशिश करता हूं
अख़बार के पन्नों में
एक मुकम्मिल अख़बार
ढूंढने की
लेकिन
हर बार
मुझे मिलता है
खून से लथपथ
एक निकम्मा तंत्र
जिसका
हरेक पुर्जा बिकाऊ है।
मैं
समझ नहीं पाता कि
हादसा किसे कहूं
तंत्र के जाहिल और भ्रष्ट हो जाने को
या
एक मुकम्मिल अख़बार के
ऐसे ही एक तंत्र में
तब्दील हो जाने को?
Friday, July 20, 2007
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10 comments:
सत्येंद्र भाई,
बेहद शानदार और सोचने को मजबूर करने वाली कविता लिखी है आपने। सही ही है, इस संवेदनहीन, भ्रष्ट सामाजिक तंत्र का ही हिस्सा बन चुका है पॉपुलर मीडिया। इस बारे में यदि आपको अप्टन सिंक्लेयर की किताब दि ब्रास चेक, पढ़ने को मिले तो जरूरी पढि़येगा। मुझे उसके कुछ अंश ही पढ़ने को मिले थे। लेकिन इस अमेरिकी लेखक की पुस्तक को पढ़ने के बाद लगा कि देश कोई भी हो, असल सवाल व्यवस्था का है, जिसका हिस्सा है यह मीडिया और इस तंत्र की तरह ही इसकी चालक शक्ति भी मुनाफा ही है, मानवीय हित नहीं।
इस तरह की कविताएं लिखना जारी रखिएगा और संवेदनहीन मीडिया जगत में अपनी संवेदनाएं बचाए रखिएगा, वरना आपकी कविताओं के शब्द अपना अर्थ खो देंगे।
ऐसी कविताओं और ऐसे विचार जो कुछ पढ़कर समझते हैं की जरुरत है भाई, क्या शानदार प्रस्तुतिकरण है…।
बहुत गहरी सोच है भाई. बहुत सुन्दर-ऐसी ही रचनायें पढ़ने का इन्तजार है.
बिल्कुल ठीक सत्येंद्र भाई. मीडिया अब खुद एक ऐसे ही तंत्र में तब्दील हो चुकी है. इसका सच हमसे-आपसे बेहतर कौन जानता होगा! बधाई.
सत्येन्द्र जी,बहुत बढिया रचना है।अर्थप्रधान समाज का मुखोटा यही तो है।जहाँ सब कुछ बिक रहा है।आशा है और रचनाएं भी पढने को मिलती रहेगी।
दिल को छू लेने वाली रचना।
मुझे लगता है कि अब हमारे गायको को ऐसी रचना भी गानी चाहिये ताकि नयी पीढी सच को जान सके और सुधार के लिये कुछ कर सके।
शुभकामनाए।
बहुत खूब ....दिल तक जाती है आपकी कविता ...
"अब मैं फ़सादों की ख़बर सुन कर लर्ज जाता हून
घर मे एक ही था बेटा कमाने वाला "
कुछ एसा ही दर्द उठता है ,जब -जब मैं अख़बार पड़ता हून
रवीश भाई और सत्येंद्रजी क्यों न इसी बहाने राजधानी दिल्ली से छपने वाले प्रमुख समाचार पत्रों और चैनलों का सवे करा लेते हैं कि मुख्य पृष्ठ पर कैसी-कैसी तस्वीर छप रही है और चैनल कब किस तरह के प्रोग्राम में युवतियों को दीखाने का काम कर रही है। सारी बातें खुलकर सामने आएगी। सभी लोग सच्चाई से इसी बहाने अवगत हो जाएंगे और मीडिया मालिक और संपादकों भी एकबारगी सोचने के लिए विवश होंगे।
hello sir
this is vivek vashistha
nice to see you and your work. 'bhookh' achhi lagi.
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