सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के ब्लॉग पर आपका स्वागत है। ऐसे ही आते रहिए, अच्छा लगता है

 

 

Monday, July 16, 2007

सुरेंद्र दीप की तीन कविताएं


सुरेंद्र दीप युवा कवि हैं। कोलकाता में रेलवे में काम करते हैं। ग़ज़ब की ऊर्जा और चीजों पर अच्छी पकड़ है। देश के कई पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं लगातार छपती रही हैं। हाल ही में देशबंधु और उत्तर प्रदेश में भी उनकी कुछ कविताएं आई हैं। यहां पेश है उनके कविता संग्रह आयताकार दीवारें की तीन कविताएं। उम्मीद हैं आपको पसंद आएंगी।


मैं और कहीं नहीं गया था
मैं और कहीं नहीं गया था
सीधे वहीं से चला आ रहा हूं
जहां तुमने भेजा था झोले के साथ

सच कहता हूं
रास्ते में न कोई दोस्त मिला
और न ही मैंने कसी को
एक कप चाय पिलाई
सीधे चला आ रहा हूं

नहीं रूका उस दुकान पर भी
जहां देखा करता हूं पत्र-पत्रिकाएं
इच्छा भी हुई कि रूककर
एक-दो पत्रिकाओं के पन्ने पलट लूं
एक दो लेता चलूं
पढ़ूं, दोस्तों को खत लिखूं
पर लाचार था

तुम्हें अभी भी विश्वास नहीं होता
मैं उसी बाज़ार में गया था
जहां रोज जाया करता हूं
उसी रास्ते से गया था
जिसकी अभ्यस्त मेरी टूटी साइकिल है
मैं उन्हीं दुकानों पर गया था
जिसका ग्राहक मेरा पॉकेट हुआ करता है

तुम्हें कैसे विश्वास दिलाऊं
कि मैंने साग, मूली, लौकी, गोभी, आलू, टमाटर
सबको मनाकर घर लाने की कोशिश की
मगर सब अपने-अपने मुंह बिचका रहे थे।
लाचार हो
मैंने खुद को एक पलड़े पर रख दिया
और महसूस किया
कि मेरा वजन बहुत कम हो गया है
मैंने झोले पर निगाह तक न डाली
जो मिला उसे ही लेकर चला आया
मेरा विश्वास करो...
अब मैं बहुत हल्का हो गया हूं।

भावी घर
कभी मेरी खुली आंखों में
तैरने लगता है
ज़मीन का एक अपना टुकड़ा

कभी मेरे कच्चे सपनों में
खड़ी होने लगती हैं
आयताकार दीवारें

कभी मेरे मन के आकाश में
फैलने लगते हैं छप्पर

कभी मेरे विचारों के दर्पण में
लेने लगते हैं आकार
रोशनी और हवा के कंधों पर
हाथ धरे रोशनदान

और कभी मेरी संवेदना
दूर आकार ले रही
आकृतियों की
राह देखने लगती हैं

जब ये सभी
मिलकर एक कोलाज बनाते हैं
तब मैं
अपने को भावी घर में बैठा पाता हूं

मां
मां
चश्मे पर विश्वास करती है
और चश्मे का विश्वास
मां से उठता जा रहा है
मां
डॉक्टर से बार-बार सलाह लेती है
डॉक्टर की सलाह उसे जंचती है
अच्छी लगती है
वह चाहती है फिर से
विश्वास की दुनिया में शामिल होना
किलकिलाते शिशुओं को हूबहू देखना
बेटों और बहुओं के चेहरों पर फैली
अनगढ़ रेखाओं को साफ-साफ पढ़ना
पति के लिए बनी चाय में
खुद ही शक्कर बन जाना

लेकिन
चूकती नज़रों के परे जो घर है
मां को उसकी तस्वीर
कहीं अधिक धुंधली महसूस होती है
डॉक्टर को चूकती नज़र
आंखों के अंदर दिखाई देती है
जबकि मां अच्छी तरह से जानती है
उसकी आंखों की रोशनी
घर के भार से
दिन पर दिन दबती जा रही है।

4 comments:

Isht Deo Sankrityaayan said...

बहुत ख़ूब गुरू. ऐसे कुछ मित्रों से परिचय कराते रहें. रचनाधर्मिता के क्षेत्र में यह भी बड़ा योगदान होगा.

Isht Deo Sankrityaayan said...

बहुत ख़ूब गुरू. ऐसे कुछ मित्रों से परिचय कराते रहें. रचनाधर्मिता के क्षेत्र में यह भी बड़ा योगदान होगा.

Udan Tashtari said...

यार सत्येन्द्र भाई, जो खूब लिखते हो वैसी ही बेहतरीन पसंद भी. दीवाना बना कर छोड़ दिया आपने...अब तो बिना मिले न चल पायेगा. नवम्बर मे दिल्ली आ रहे हैं, मिलना जरुर...या जहाँ होगे, मिल बैठ चर्चा जरुर होगी यह वादा रहा....बहुत बढ़िया मित्र. आनन्द आ गया. साथ ही अपने इष्टदेव से भी मिलेंगे... :) बहुत दिली तमन्ना है. :)

दीपक भारतदीप said...

kavi ko meree trf se shubhkaamnaaen
deepak bharatdeep