चटकल कहानी जारी है। अब तक आपने तीन हिस्से पढ़े-बदली मजदूर, काम की कमी और ट्रेड यूनियन का खेल, लाल झंडे का सपना और उम्मीदों का पहाड़ और कारखाना, चाय की दुकान और मार्क्सवाद का मछली बाज़ार । आज पेश है इससे आगे का भाग।
तीन घंटे बीत गये थे। रात के नौ बज रहे थे। जवाहर नहीं आया। अब आने की संभावना भी नहीं थी। यूनियन ऑफिस लगभग खाली हो चुका था। चार पांच लोग थे और लग रहा था कि वे ही यूनियन ऑफिस बंद कर चले जायेंगे। चाय की दुकान भी खाली हो गई थी। चाय वाले की नज़र अब उस पर पड़ी।
--क्या भाई? क्या बात है? शायद तुम शाम से ही यहां बैठे हो? कोई काम-धाम नहीं है क्या?
नरेश लगभग घबड़ा गया। याद आ गई चाय वाले बिना ऑर्डर के बैठने वालों को भगा देता है। उसे लगा अब बेइज्जत भी होना पड़ेगा। उसने लगभग डरते-डरते कहा--माफ करना भाई, तुम्हारी दुकान पर बहुत देर बैठ गया। एक आदमी का इंतजार कर रहा था लेकिन वह आया नहीं।
--कोई बात नहीं। यहां बैठने की मनाही नहीं है। ग्यारह बजे तक दुकान खुली रहती है तुम और दो घंटे बैठ सकते हो लेकिन बात क्या है? बहुत परेशान हो।
नरेश को राहत मिली। उसने अपना पूरा दिल उघाड़ कर रख दिया। इस ज़माने में ऐसा आदमी कहां मिलता है, जो दूसरों का दर्द सुनने के लिए वक्त निकाल सके।
--तो अभी तुम्हें दौड़ायेंगे सब। नेता लोग इतना जल्दी काम थोड़े ही करते हैं? मैं तो बरसों से यही देख रहा हूं? चाय वाले ने कहा और साथ ही पूछा---चाय पियोगे?
नरेश चुप रहा।
--पैसे की चिंता न करो। जब काम मिलेगा तो दे देना। शाम से बैठे हो। अरे छोटू, बाबू को चाय देना।
छोटू चाय दे गया।
नरेश ने पूछा--दौड़ाते हैं लेकिन काम तो कर देते हैं न?
नरेश दौड़ने के लिए तैयार था।
--देखो भाई, काम होता भी और नहीं भी होता है। सब इस बात पर है कि तुम्हारा सोर्स कैसा है।
सोर्स तो उसका जवाहर था। कायदे से मजबूत सोर्स था। काम हो जाना चाहिए था लेकिन वह चुप ही रहा।
--जाओ, अब कल एक बार फिर चक्कर लगाना। अब तो इतनी रात को यहां कोई आयेगा भी नहीं और अब ऑफिस तो बंद भी होगा।
कुछ देर बाद ऑफिस बंद भी हो गया. नरेश टूट गया। जब तक ऑफिस खुली थी उम्मीद की एक किरण बाकी थी कि शायद जवाहर आ जाय। भले ही जतीन दा से भेंट नहीं हो लेकिन जवाहर से भेंट होने पर भी उसे थोड़ी तसल्ली, थोड़ा दिलासा मिल जाता। वह बुरी तरह थक गया था। मानसिक रूप से भी और शारीरिक रूप से भी। किस मुंह से घर जाय। पता नहीं क्यों घर शब्द से ही अब उसे चिढ़ होने लगी थी। अभाव और घर दोनों एक साथ नहीं हो सकते। आदमी की ज़िन्दगी में इनमें से कोई एक ही होना चाहिए। घर जाते ही सुरसती का सवाल--क्या हुआ जी और जवाब सुनने के बाद उससे भी कठिन सवाल--अब क्या होगा जी?
दूसरे दिन भी वह तय समय पर यूनियन ऑफिस पहुंच गया था। चाय वाले से जान-पहचान हो गई थी। बैठते ही चाय आ गई। वह चकित रह गया। चाय वाले ने कहा--चिंता न करो। दो चाय का पैसा हो गया। काम मिलते ही दे देना। चाय वाले ने उधारी शुरू कर दी थी। उधार लेते उसका दिल कांप उठा लेकिन निराला काका की बात याद आ गई--चटकल में काम करोगे और उधार नहीं लोगे-- यह कैसे हो सकता है। और उसके बाद खुला ठहाका। ऊपर से नीचे तक कर्ज में डूबे निराला काका कैसे ठहाके लगा लेते थे, यह बात आज तक नरेश नहीं समझ पाया। कर्जदारों के तकादे आते, गालियां सुनते लेकिन फिर अपने रंग में। जोरदार ठहाके। ठहाकों पर ठहाका। घर में चूल्हा नहीं जला तो ठहाका, पत्नी से झगड़ा हुआ तो ठहाका, मिल में किसी बाबू से झगड़ा हुआ तो ठहाका। केवल ठहाका। निराला काका को देख उसे आश्चर्य भी होता और बल भी मिलता। दुखों से दो दो हाथ करने की ताकत मिलती। ज्ञान भी अच्छा था निराला काका का। पुराने जमाने के मैट्रिक पास थे। बहुत कुछ बताते थे नरेश को। नरेश ने उनसे बहुत कुछ सीखा था, समझा था लेकिन यूनियन वाली बात उसने अभी तक निराला काका को नहीं बताया था। बताते तो फिर लगता जोरदार ठहाका और फिर ऐसी बातें कि उसका दिल बैठ जाता। उसने सिर झटक दिया। चाय ठंडी हो रही थी। वह चाय सुड़कने लगा।
यूनियन ऑफिस अभी खुला नहीं था। चार बजे के आसपास खुलता था। उस दिन जवाहर आया था। जतीन दा से मुलाकात भी हुई। जतीन दा ने ढेर सारे सवाल दागे--कब से इहां हो, अब तक यूनियन में काहे नहीं आया। फिर जवाहर से पूछा था-चंदा दे पाएगा ये? जवाहर ने नरेश से पूछा--चंदा कहां से दोगे? मेम्बर बनने के लिए चंदा देना पड़ता है।
नरेश चुप। इस बात का उसके पास कोई जवाब नहीं था। जवाहर ने सुझाया-काम मिलने के बाद दे देना?
कितना अच्छा सुझाव था। नरेश तत्काल राजी हो गया। जवाहर को उसने ऐसे देखा मानो वो भगवान हो। बाद में जवाहर ने बताया था कि बाद में चंदा देने पर थोड़े ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं। कोई बात नहीं, थोड़ा ज्यादा पैसा दे देगा। पहले काम तो मिले। आखिरकार जवाहर की मदद से वो लाल हो गया। लाल झंडा का आदमी। अपने आप उसकी अक़ड़ थोड़ी बढ़ गई। शायद अब रोटी के लाले नहीं पड़े। सिर उठाकर घर पहुंचा था।
कल कहानी की आखिरी किस्त पढ़ें
Saturday, July 14, 2007
लाल हुआ नरेश, बढ़ गई अकड़
Labels:
कहानियां
Subscribe to:
Post Comments (Atom)


4 comments:
what a good story bahoot badhiya hai
is kahaanee ke peechhe jo vyngya hai use samjhnaa jaroore hai.
Deepak bharatdeep
सही जा रही है कहानी. अच्छा लगा नरेश बाबू को कुछ मानसिक राहत मिली. अगली कड़ी का इन्तजार है.
आपके ब्लाग का टाइटिल पड़ा सो यूँ ही एक नज्म यादों के झरोखे से निकल बहार आ गयी ....................
दुस्यंत कुमार जी नज्म है जरा गौर फरमाये ...............
भूख से झुक कर दुहरा हुआ होगा बदन मेरा ॥
मैं सजदे मे नही था तुम्हे धोखा हुआ होगा ॥
Post a Comment