Tuesday, November 22, 2011

एक 'युवराज' का अल्पज्ञान

सत्ता की भूख मिटाने के लिए वोट की भीख मांगने निकला एक युवराज अगर देने वाले को ही बार-बार भिखारी कहे और इस बात पर भी जोर दे कि वो अपनी बात पर अडिग है कि उसकी राजनीतिक समझ पर सवाल उठना लाजिमी है। उत्तर प्रदेश में सत्ता में वापसी का सपना देख रही कांग्रेस की अगुवाई कर रहे राहुल गांधी ने फूलपुर में चुनाव अभिायन की शुरुआत करते हुए जोशो खरोश में ये सवाल पूछ गये थे कि आखिर यूपी के लोग कब तक महाराष्ट्र जाकर भीख मांगते रहेंगे। तब उनका आशय था कि आखिर कब तक उन्हें अपने राज्य में काम के लिए तरसना होगा? कब तक पेट की आग बुझाने के लिए वो अपनी ज़मीन छोड़ कर दूसरे राज्य में काम की तलाश में जाते रहेंगे।

राजनीति में सब एक दूसरे पर हमले की ताक में बैठे रहते हैं, ऐसे में राहुल गांधी ने भी अपने विरोधियों को बैठे बिठाए एक मुद्दा थमा दिया था। उनके जुबान फिसलने पर कोफ्त जरूर हुई थी, लेकिन तब भी मुझे ये भरोसा था कि उनका इरादा बुरा नहीं था। लेकिन आज उन्होंने इस भरोसे को हिला दिया। उस दिन सबने कहा था कि राहुल ने उत्तर प्रदेश का अपमान किया। उस दिन किया कि नहीं, नहीं जानता लेकिन आज उन्होंने जरूर उत्तर प्रदेश का अपमान कर दिया।

आज उन्होंने एक तरह से साफ कर दिया कि उनका मतलब भिखारी से ही था। राहुल का कहना है कि उन्होंने बहुत भिखारियों से बात की और सबने यही कहा कि वो उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। अपने गलत बयान को तर्कसंगत ठहराने के लिए एक और गलत बयान। ऐसा क्यों हुआ कि उन्हें जो भी भिखारी मिला, वो उत्तर प्रदेश का ही मिला?ऐसा क्यों हुआ कि उन्होंने जिन भिखारियों से बात की वो सभी उत्तर प्रदेश के ही निकले ? क्या ये भिखारी भी सियासी हैं?

सवाल बहुत है लेकिन जवाब कौन देगा? इस सवाल का जवाब तो राहुल गांधी को ही देना होगा कि उनकी अपनी सरकार के ही योजना आयोग के उपाध्यक्ष जब ये कहते नहीं थक रहे थे कि गांवों में बीस रुपये और शहरों में 32 रुपये कमाने वाला आदमी गरीब नहीं माना जा सकता, तब उन्होंने मोंटेक सिंह अहुलवालिया से कोई सवाल क्यों नहीं पूछा? अगर उस वक्त उन्होंने सरकार की गरीबी की परिभाषा पर सवाल उठाया होता तो शायद आज उनके सवाल पर सियासत कम, गंभीरता से विचार ज्यादा होता।

वोट मांगने वाला याचक होता है और जब याचक देने वाले की हैसियत पर ही सवाल उठाने लगे तो उस याचक को लोग खाली हाथ लौटा देते हैं। वोट देकर सत्ता का सुख जो जनता आपको मुहैया कराती है, वो अगर भिखारी भी है तो भी वो आपसे बड़ा है। राहुल गांधी शायद अभी ये बात समझ नहीं पाये हैं, उनकी सियासी अपरिपक्वता पर किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए लेकिन उनके सलाहकार भी तो कहीं उन्हें दिग्भ्रमित नहीं कर रहे। अन्यथा एक विवाद जो थम रहा था, उसे उन्होंने खुद ही क्यों छेड़ दिया। चुनावी जंग जुबानी जंग से ही जीती जाती है, ऐसे में अगर जुबान फिसलती है तो ये राजनीतिक समझदारी का परिचायक किसी भी रूप में नहीं हो सकता।

राहुल गांधी ही नहीं बल्कि सभी राजनीतिक दलों को ये समझ लेना चाहिए कि भीख चाहे जिस किस्म का भी हो उसका संबंध भूख से ही होता है। अगर यूपी के लोग पेट की भूख के लिए भीख मांगने के लिए मजबूर हैं तो कहीं न कहीं इस बड़े राज्य के साथ होने वाली राजनीति ही है। जब तक लोगों की भूख से राजनीति होती रहेगी, तब तक उन्हें इधर-उधर भटकते रहना पड़ेगा, अपनी जमीन छोड़नी पड़ेगी, यानि आपके शब्दों में भीख मांगते रहना पड़ेगा। तो बेहतर ये नहीं होता कि आप जनता से सवाल पूछने की बजाय खुद इसका जवाब ढूंढिए।


Saturday, October 1, 2011

बीजेपी की विडंबना

भ्रष्टाचार का एजेंडा पीछे छूट गया। प्रधानमंत्री की कुर्सी सामने आ गई। जब सत्ता का सर्वोच्च पद सामने हो तो नेता का मन ना डोले ऐसा कैसे हो सकता है? मौजूदा दौर में आखिर आदमी राजनीति में सत्ता का स्वाद चखने के लिए ही तो आता है। भारतीय जनता पार्टी के साथ भी ऐसा ही हादसा हो गया। अमेरिकी कांग्रेस ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अगले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी का सबसे प्रबल दावेदार क्या बता दिया, बीजेपी की राजनीति की लाइन ही बदल गई। पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ डंका पीट रही पार्टी इस बहस में उलझकर रह गई है कि लालकृष्ण आडवाणी या नरेंद्र मोदी? आखिर कौन होगा बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार। इस पर भी बीजेपी तीन धड़ों में बंटी हुई है। कुछ आडवाणी के पक्ष में बयान दे रहे हैं तो कुछ मोदी के पक्ष में। और कुछ ने साध ली है चुप्पी।

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की मुहिम का समर्थन कर बीजेपी ने जो सियासी फायदे उठाने की कोशिश की, उस पर इस बहस ने पानी फेर दिया। बीजेपी अपने पक्ष में एक माहौल बनाने में कामयाब हो पाई थी। भ्रष्टाचार के लगातार आरोपों से घिरे यूपीए और खासतौर पर कांग्रेस की छवि को जिस तरह धक्का पहुंचा है, उसने बीजेपी का आधा काम ऐसे ही आसान कर दिया था, ऊपर से बीजेपी ने जनलोकपाल के लिए अन्ना के आंदोलन का समर्थन कर भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूती से खड़े एक दल के रूप में अपनी छवि पेश करने में सफल हुई थी। इसी मौके का फायदा उठाने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ रथयात्रा निकालने का ऐलान कर दिया और यहीं से बीजेपी में गड़बड़ी की शुरुआत हुई।

बीजेपी की नई पीढ़ी के नेताओं को लगा मानो प्रधानमंत्री बनने का अधूऱा ख्वाब एक बार फिर आडवाणी के मन में हिलारे मारने लगा है। हालांकि आडवाणी ने इस मामले में न केवल राष्ट्रीय स्यवं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत से मिलकर अपनी सफाई दी बल्कि ये ऐलान भी कर दिया कि वो प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नहीं हैं लेकिन राजनीति में ऐसे बयानों का कोई मतलब नहीं होता, ये सबको पता है। इसकी काट में नरेंद्र मोदी ने तीन दिन के उपवास का ऐलान किया। गुजरात मे ंसद्भावना के लिए उपवास। गुजरात की एकता के लिए उपवास। गुजरात की शांति के लिए उपवास लेकिन सबने कहा कि ये उपवास है प्रधानमंत्री बनने के लिए।

मोदी के इस सद्भावना मिशन के साथ ही बीजेपी से मानो सद्भावना गायब हो गई। प्रधानमंत्री पद के लिए काबिल उम्मीदवार की तलाश की जंग शुरू हो गई। भ्रष्टाचार के मूल एजेंडा बहुत पीछे छूट गया और इसके साथ ही बीजेपी ने वो बढ़त गंवा दी, जो उसने अन्ना के आंदोलन का समर्थन कर हासिल किया था।
अब तो बीजेपी में प्रधानमंत्री पद को लेकर इस तरह बहस चल रही है मानो बीजेपी ने लोकसभा चुनाव जीत लिया हो और सिर्फ प्रधानमंत्री का चयन बाकी है। ये बहस बीजेपी के भविष्य के लिए जाहिर तौर पर अच्छा नहीं है।

बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भी ये ही मुद्दा छाया रहा। हर बात होती रही लेकिन नेताओं के मन में मोदी बनाम आडवाणी की जंग चलती रही। बैठक में नहीं आकर भी बैठक पर मोदी छाये रहे। इस बहस में पड़ने की बजाय बीजेपी को ये समझ लेना चाहिए कि अगर उसे प्रधानमंत्री का पद हासिल करना है तो पहले लोकसभा चुनाव जीतना होगा और इसके लिए कडी मेहनत की जरूरत है न कि इस बात पर बहस करने कि कौन बनेगा प्रधानमंत्री।
प्रधानमंत्री बनने की हसरत पाल रहे मोदी को भी ये समझ लेना चाहिए की भारत गुजरात नहीं है। वो गुजरात में विधानसभा चुनाव जीत कर मुख्यमंत्री बनना और पूरे देश से जनसमर्थन हासिल कर प्रधानमंत्री बनने में जमीन आसमान का फर्क है। दंगों के ठीक बाद जब मैं 2002 में गुजरात विधानसभा चुनाव कवर करने गया था तो देखा था कि वहां धर्म के आधार पर समाज किस तरह बंटा हुआ है। सद्भावना मिशन ने इस बंटवारे को एक बार फिर ताजा कर दिया है। मोदी नेउपवास के जरिए सद्भावना के बहाने कहीं न कहीं ये संदेश भी दे दिया है कि वो वही मोदी हैं। मंच पर इमाम से टोपी स्वीकार न कर वो अपने कट्टर हिंदूवादी मतदाताओं को ये भरोसा देने में कामयाब रहे हैं कि सद्भावना मिशन सिवाय राजनीति के और कुछ नहीं। देश की जनता भी ये समझती है।अगर बीजेपी मोदी को आगे कर लोकसभा चुनाव लड़ने का सपना देखती है तो जाहिर है केंद्र में आने का उसका सपना सपना ही रह जाएगा।

Sunday, July 24, 2011

नमक दाल भी नहीं बेचने देंगे

रिटेल बाजार में 51 फीसदी विदेशी निवेश की सिफारिश की गई है. सचिवों की कमेटी ने इसे मंजूरी दे दी है अब सरकार को आखिरी फैसला लेना है. यानि गरीबों के पेट पर एक और लात। घर के बगल में किराना का दुकान चलाने वाला पहले से ही सुपर स्टोर से परेशान था, अब विदेशी उसे नमक दाल भी नहीं बेचने देंगे। पता नहीं गरीबों का और कितना बुरा हाल होना है।

Saturday, July 23, 2011

फिर भी दिल है हिंदुस्तानी

दिल्ली पुलिस का एक और साहसिक कारनामा। 2008 में यूपीए सरकार को रिश्वत के जरिए बचाने का मास्टर माइंड सुहैल हिंदुस्तानी को बना दिया। बड़े लोगों को बचाने के लिए एक 'हिंदुस्तानी' की कुर्बानी। जिसने पैसा ढोया वो मास्टर माइंड। बाकी सब गायब। अगर दिल्ली पुलिस सही है तो दो बातें तय है। एक रिश्वतखोरी के जरिए ही सरकार बची थी। दूसरी, सुहैल हिंदुस्तानी काग्रेस किसी भी तेज तर्रार शातिर ट्रबलशूटर से भी ज्यादा तेज़ है। अगर कांग्रेस ने उसके लिए अपने दरवाजे खोल दिये तो फिर मौजूदा कई ट्रबलशूटर कांग्रेसी नेताओं का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा।

Saturday, May 21, 2011

जिंदगी की तलाश

एक लम्हा

जिंदगी का तलाशता

ही रह गया

पता ही नहीं चला

कब खत्म हो गई

जिंदगी।

Sunday, December 5, 2010

शीला की जवानी का खौफ

शीला की जवानी से अभी पूरा देश थर्रा रहा है। ऐसी जवानी इससे पहले न कभी किसी ने देखी, न सुनी। लेकिन अब ये जवानी खूब देखी जा रही है, खूब सुनी जा रही। लोग थिरक रहे हैं। शीला के जवान होने का जश्न मना रहे हैं। मुन्नी की बदनामी के सदमे से अभी लोग उबर भी नहीं पाये थे कि शीला अचानक जवान हो गई। ऐसी जवान हुई कि बस हर जगह सिर्फ शीला ही शीला। टीवी खोलते ही शीला एलान-ए-जवानी करती नजर आ जाती है। आधे-अधूरे कपड़ों में।

शीला की इस जवानी का प्रचार-प्रसार को देख सी ग्रेड फिल्मों की शीला और पीले कवर में कैद मस्तराम कपूर जैसे लेखकों की शीला भी मुहं छिपाती फिर रही होगी। या फिर हो सकता है कि पीले कवर वाली शीला शापमुक्त हो गई है। पीले कवर को फाड़ वो सीधे हमारे-आपके ड्राइंग रूम में घुस आई है।

इससे पहले मुन्नी बदनाम हुई थी। ऐसी बदमानी जिसने मुन्नी को पूरी दुनिया में मशहूर कर दिया। बदनामी के इस भोंपू पर वो लोग भी खूब थिरक रहे हैं, जो कभी बदनाम नहीं हुए। मुन्नी की बदनामी में कोई शर्मबोध नहीं है, बल्कि गर्वबोध है। बदलते जमाने के साथ सोच में ऐसा बदलाव खतरनाक ही माना जाएगा, जब बदनामी डराती नहीं बल्कि सीना फूला कर चलने का एहसास देती है। ये सिर्फ हिंदी फिल्मी संगीत में आ रही लगातार गिरावट का ही परिचायक नहीं है बल्कि कहीं न कहीं हमारे चारित्रिक अधो:पतन का भी संकेत है। अब लोग अपनी बिटिया को प्यार से मुन्नी बुलाने से पहले सौ बार सोचेंगे।

हिंदी फिल्मी गानों का ऐसा पतन देख, उन सभी लोगों को बड़ी तकलीफ हो रही होगी, जो बॉलीवुड के उस हसीन दौर के दीवाने हैं, जब गाने के बोल सार्थक होते थे और संगीत कर्णप्रिय। अब तो गाने की एक एक लाइन ही याद रहती है—शीला की जवानी....और मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए। न कोई सिर न कोई पैर, बस संगीत के नाम पर शोर और बोल के नाम पर अश्लीलता की भरमार। मुन्नी और शीला के बाद अब शकीरा के कमर के लोच और ठुमकों को चुनौती देने वाले गाने भी बज रहे हैं।

संगीत पहले साधना थी। गीतकार साहित्य रचने की कोशिश करता था। कुछ नया रचने की कोशिश थी। अब रचना नहीं है, बेचना है और बेचने के लिए वो सब कुछ करने की जरूरत है, जिससे सामान बिक जाय। अब हर आदमी सेल्समैन है, चाहें हो संगीतकार हो या गीतकार। चाहें निर्माता हो या निर्देशक। देखना है बॉलीवुड का ये नया दौर कब तक चलता है। ये भी देखना होगा कि हम और नीचे गिरते हैं, या फिर इससे उबर कर वापसी की कोशिश भी करते हैं।

Friday, December 3, 2010

निकलो कि जैसे निकलता है सूरज


नूर मुहम्मद नूर की कविता

निकलो, कि निकलने का
सबसे सही वक्त यही है
वक्त, जो कि जिंदगियों के
बेहया, अंधेरों में ठहर सा गया है
पथरा गया है
कि जैसे पथराये चले जा रहे हैं
दिलों और सपनों के
जिंदादिल हुजूम
लड़ने और जीने की इच्छाएं

निकलो, जैसे निकलता है
सुंदर गुलाबी लाल सूरज
करता हुआ मटियामेट
अंधेरों का तिलस्मी साम्राज्य
बिखेरता हुआ उजाला और ताप

निकलो, कि तुम्हें निकले हुए
बहुत दिन हो गये, बहुत साल
कि इन बहुत-बहुत सालों में
जन्मे सिर्फ बहुत-बहुत सवाल
बहुत-बहुत दुख
बहुत बहुत घाव
बहुत बहुत दर्द
कि बहुत-बहुत उपायों ने
धारे बहुत-बहुत रूप
बहुत-बहुत रंग
कि फिर भी होता गया
सब कुछ बदरूप-बेरंग बहुत-बहुत

निकलो, कि तुम बार-बार निकली हो
और बार-बार निकली हैं सुरतें
जीने की,
आदमी के जीवन की
जिसके लिए चल रही है लड़ाई
आज हर क्षण
इस दुनिया के हर हिस्से में
हर देश, हर नगर
लगभग हर कविता
हर किस्से में
उस जीवन के लिए
उस जीवन की निरंतरता के लिए , निकलो

निकलो इसी जीवन की
गतिशीलता के लिए
जो सुंदर है, सुखद है
प्रियकर है और
जिससे बड़ा सच कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं इस दुनिया में
इस दुनिया को
दुनिया बनाये रखने के लिए निकलो

निकलो, कि तुम्हारे निकलने की
देख रही हैं राह
दुनिया की करोड़ों-करोड़ आंखें
निकलो कि जैसे निकलता है सूरज
कि जैसे दानों से निकलता है अंकुर
आंखों से आंसू
दिल से आह
धुआं और ताप जैसे आग
रौशनी, चराग से
कि जैसे पेड़ों से डालियां
डालियों से पत्ते
फूलों से गंध
निकलो निर्बंध

निकलो, कि जैसे निकलती है हवा
मुंह से दुआ
और किरनों की डोली
बंदूक से गोली
कमान से तीर
हे, शमशीर निकलो
हे सच की तस्वीर, निकलो
हे कविते, निकलो
निकलो शब्दों-अर्थों के
दुर्ग ढाह कर निकलो
निकलो तोड़कर
भाषा-शिल्प की
दुर्बोध प्राचीर

कि इस तरह निकलने का
सबसे सही वक्त यही है
सही वक्त
हां, वही वक्त
जो आज आदमी का
आदमी के जीवन का
सबसे बुरा वक्त है
हां, सबसे बुरा वक्त।

नूर मुहम्मद नूर के कविता संग्रह 'ताकि खिलखिलाती रहे' पृथ्वी से साभार

Tuesday, November 30, 2010

ग़ालिब

गोपाल प्रसाद

गूंगे और बलबलाते
लोगों के बीच
एक जीभ वाला राजा था

अपने खजानों और तहखानों में
वक्रोक्तियों को सिर्फ़
छिपाए ही नहीं रहा वो
दुनिया को बांटता रहा
वक्त बेवक्त

एक बहुत बड़ी भीड़ से
उगा था वह
और सारी जिंदगी खुद को
उसी से जोड़ता काटता रहा

सतह पर नहीं
नदी की तह में
कुछ खोजना, कुछ चुनना
उसकी आदतों में शामिल था

जहां भी लोग पूछते--
कौन है वह?
वह ऐसा था कि अपनी पहचान
खुद ही मिटाता रहा

दर्द में भी खूब गाया
और उसकी
रहने वाली दुनिया
भली चंगी हो गई

सुनता हूं
बाकी सब कुछ होते हैं
कुछ लोग
सिर्फ़ मनुष्य नहीं होते
वही सिर्फ़ मनुष्य था
और उसका नाम?
जो नहीं जानते
वे
इतिहास में--
बाकी सब कुछ होते हैं
इसके अलावा
और कुछ नहीं होते।

1965








दिल पर मत लो यार, अमेरिका तो ऐसा ही है

शायद इसे ही कहते हैं मुंह में राम बगल में छूरी।

ओबामा भारत आये तो कह गए कि अमेरिका भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य के रूप में देखना चाहता है।

दूसरी ओर विकीलीक्स ने जो दस्तावेज लीक किये हैं, उसमें उनकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत के इस दावे पर बहुत तीखे तेवर में दिखती हैं। दस्तावेजों के मुताबिक हिलेरी का मानना है कि भारत स्थायी सदस्य का स्वयंभू दावेदार बन गया है यानि कोई चाहे न चाहे केवल भारत ये चाहता है कि वो स्थायी सदस्य बन जाय। और इसलिए उसने अपने अफसरों को संयुक्त राष्ट्र में तैनात भारतीय राजनयिकों की जासूसी में लगा दिया। उन्हें ये जिम्मेदारी दी गई थी कि वो इस बात की पल-पल की खबर लगाएं कि स्थायी सदस्यता हासिल करने के लिए भारतीय राजनयिक क्या कोशिशें कर रहे हैं।

वैसे अमेरिका का ये आचरण किसी के लिए भी चौंकाने वाला नहीं है। अमेरिका आज इसलिए अमेरिका है क्योंकि वो सिर्फ अपने बारे में सोचता है। उसे सब पर दादागीरी दिखानी है, अपनी शर्तों पर अपने हथियार बेचने हैं, दो देशों को लड़ाना है और फिर पंचायत भी करनी है। अमेरिका से हाथ मिलाने वाले भी समझते हैं कि ये दोस्त ऐसा है जो ऊपर से कुछ और अन्दर से कुछ और है। इसलिए इतने अहम दस्तावेज जारी होने के बावजूद कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हुई।

वैसे ये भी हैरानी की बात है कि इन दस्तावेजों को लेकर अमेरिका चिंतित था। इसलिए उसने उन सभी देशों को, जो उसे अपना दोस्त मानते हैं (वो तो दोस्त के नाम पर क्लाइंट ही मानता होगा), आगाह कर दिया था कि भैया, दिल पर मत लेना—ये दस्तावेज संबंध बिगाड़ने वाले हैं।

तो ओबामा भैया, कोई दिल पर क्यों लेगा? जो आपसे दिल लगाएगा वो पछताएगा, आपसे दोस्ती तो दिमाग से ही करनी होगी।

Monday, November 29, 2010

ये मेरा भ्रष्टाचार, ये तेरा भ्रष्टाचार

एक के बाद एक भ्रष्टाचार के ऐसे खुलासे हो रहे हैं, मानो देश में करप्शन में एक दूसरे को मात देकर आगे निकल जाने की होड़ मची हुई हो। मानो घपले में घिरे लोग खुद को एक दूसरे से ज्यादा अव्वल साबित करने पर जुटे हुए हों। जिस रफ्तार से घोटालों का पर्दाफाश हो रहा है, उस रफ्तार से दोषियों की शिनाख्त कर उन्हें दंडित करने की कोई दिलचस्पी प्रशासन या सरकार में नहीं दिख रही।

हालिया घोटालों की बात करें तो खेल में करप्शन का जो खेल शुरू हुआ, वो अब थमता नहीं दिख रहा है। खेल से निकल कर टेलीकॉम, फ्लैट, जमीन हर जगह बस घोटाला ही घोटाला। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का भूत अभी खुल कर पूरी तरह सामने भी नहीं आया था कि कारगिल के शहीदों के परिजनों के नाम पर फ्लैट हथियाने का मामला पूरे देश को स्तब्ध कर गया। मुंबई का आदर्श बिल्डिंग सोसाइटी घोटाले में अब एक के बाद एक खुलासे हो रहे हैं औऱ हद तो तब जब जांच प्रगति पर है तो फाइल्स से अहम पन्ने गायब हो गये। यानि घोटाले की जांच भी चल रही है, साथ ही सबूत मिटाने का घोटाला भी चल रहा है।

इस घोटाले ने अशोक चव्हाण की कुर्सी छीन ली। कांग्रेस आलाकमान ने इस्तीफा मांगा और अशोक चव्हाण दिल्ली आकर इस्तीफा सौंप दिया। नैतिक आधार पर इस्तीफा देने की पोस्चरिंग की गई लेकिन काबिले गौर बात ये रही कि अशोक ने इस्तीफा दे दिया। लेकिन कर्नाटक में ठीक इसके उलट घोटालों के गंभीर आरोपों में फंसे बीजेपी के मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा ने बगावती तेवर अपनाकर औऱ संख्या बल का हवाला देकर बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को ऐसी आंखें दिखाईं कि उनसे इस्तीफा मांगने की हिम्मत ही नहीं पड़ी। घोटाले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कर्नाटक के लोकायुक्त श्री हेगड़े ये कहने पर मजबूर हो गये कि राज्य में हर सरकार पिछली सरकार से ज्यादा भ्रष्ट है। यही नहीं अब उन्हें इस बात का पछतावा भी है कि उन्होंने अपना इस्तीफा वापस क्यों ले लिया।

दूसरी ओर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर संसद करीब पिछले दो हफ्ते से ठप पड़ी है। बीजेपी जेपीसी से मामले की जांच कराने की मांग कर रही है और इस बात पर अड़ी है कि जब तक जेपीसी से जांच का ऐलान नहीं होगा तब तक वो संसद नहीं चलने देगी। घोटाले गंभीर है और तह तक इनकी जांच होनी चाहिए और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए लेकिन यहीं उठते हैं, कुछ सवाल जो जवाब मांगते हैं।

जनता जानना चाहती है कि जब बीजेपी येदियुरप्पा से इस्तीफा नहीं ले सकी और उन्हें कुर्सी पर बने रहने दिया तो आखिर वो किस मुंह से घोटाले के मुद्दे पर इस तरह हंगामा कर रही है? मैं ये नहीं कहता कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की उचित जांच नहीं होनी चाहिए लेकिन घोटाला तो घोटाला है, एक घोटाले के लिए एक मापदंड और दूसरे घोटाले के दूसरा। यानि घोटाला दूसरी पार्टी से जुड़ा है तो बड़ा घोटाला और अपनी पार्टी से जुड़ा है तो कोई बात नहीं।

ये बात सिर्फ बीजेपी की नहीं है बल्कि हर पार्टी के साथ कमोवेश यही हाल है। घोटाला देश के साथ धोखा है और घोटालेबाज सिर्फ देश का अपराधी है। उसके साथ वही बर्ताव होना चाहिए, जैसा किसी अपराधी के साथ होता है, न कि पार्टी में पहुंच और ताकत के हिसाब से ट्रीटमेंट। जब तक राजनीतिक दल ऐसा रवैया अख्तियार नहीं करेंगे और घोटाला करने वालों की ढाल बनते रहेंगे, तब तक ने तो दोषियों को सज़ा मिलेगी, न ही घोटाले रुकेंगे। पहल तो राजनीतिक दलों को ही करनी होगी क्योंकि कमोवेश हर घोटाले की अमरवेल उनके दफ्तर से होकर ही निकलती है।

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के ब्लॉग पर आपका स्वागत है। ऐसे ही आते रहिए, अच्छा लगता है