Wednesday, May 15, 2013

वो जो मेरी जिंदगी थे, आज उखड़े-उखड़े हैं


मेरी एक ग़ज़ल

आज फिर टूट के अरमान कई बिखरे हैं
कहूं अब किससे, ये जो मेरे दिल के दुखड़े हैं।

दर्द सैलाब का, पर डूब रही नैया है
वो जो मेरी जिंदगी थे, आज उखड़े-उखड़े हैं

राह में मिल गए तो पूछा-कहो कैसे हो
क्या बताऊं कि हुए दिल के कितने टुकडे हैं

किसको है फिक्र जो, भर गई आंखें मेरी
कहते आंसू जिसे, सपनों के मेरे चिथड़े हैं

हर तरफ हैं वही, दिखता है उन्हीं का चेहरा
सहे जाते नहीं, ये जो जिंदगी के नखरे हैं

Tuesday, April 30, 2013

मन

आवारा
बावरा
बेचारा
प्यार का मारा
दर्द का दुलारा
कुछ ऐसा ही परिचय दिया था उसने
जिसे लोग मेरा मन समझते हैं.

Friday, April 19, 2013

कब थमेगा ये सिलसिला?

दिल्ली में फिर पांच साल की एक बच्ची के साथ बलात्कार हुआ.
बच्ची से इलाज से लेकर प्रदर्शनकारियों से निपटने तक में दिल्ली पुलिस ने फिर दिखाई असंवेदनशीलता
क्या आपको नहीं लगता कि एक बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाने  वाले को मौत की सजा से कम  कुछ नहीं  होना चाहिए?
क्या आपको नहीं  लगता कि अब केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे और दिल्ली  के पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार को अपनी विफलता की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे देना चाहिए?

Thursday, April 11, 2013

चुप ना रहो, कुछ तो कहो


मैं सोचता हूं
तुम कुछ कहो तो टूटे सन्नाटा
तुम सोचती हो
मैं कुछ कहूं तो टूटे सन्नाटा
प्यार में जब
दिल की जगह
दखल देता है दिमाग
तो सन्नाटा टूटता नहीं
और गहराता जाता है
क्या हम सोचना बंद कर
नहीं दे सकते आवाज़
एक दूसरे को।

Saturday, April 6, 2013

कभी खत्म ना होने वाला इंतज़ार

जब
दर्द का उमड़ा था सैलाब
खूब खली थी तुम्हारी कमी

जिंदगी की
बंजर-पथरीली राहों पर
नहीं थी
मुहब्बत-अपनेपन की नमी

इंतजार करती रही
आएगा दर्द का  दोस्त
मगर नहीं आए तुम
मैं  करती रही
इंतज़ार!  इंतजार!!
बस इंतज़ार

Friday, March 29, 2013

फूल

.
ये फूल
अपनी खूबसूरती बिखेरेंगे
हम सबका िदिल  खुश करेंगे
और फिर चुपचाप
मिट्टी में मिल जाएंगे.

Tuesday, November 27, 2012

दिल की सुनो सचिन


वात्सल्य राय

रन क्या सूखेदेखने वालों की आंखों का रंग ही बदल गया। कभी जो हाथ सजदे में उठते थेवो अब जैसे पत्थर बरसाने लगे हैं । बुरा वक्त आया तो जुबां की तासीर भी बदल गई । तारीफें करने वाली जुबानें अंगारे उगलने लगीं।
जरा कीर्ति आजाद के तेवर देखिएवो कहते हैं'' सचिन के बारे में जितनी कम बात की जाए अच्छा है। हमारे यहां व्यक्ति पूजा होती है,प्रदर्शन पूजा नहीं होती।''
यहां बात उन्हीं सचिन रमेश तेंदुलकर की हो रही हैजिन्होंने तेईस साल तक हिंदुस्तानी क्रिकेट पर पूरे शान से राज किया । जिनकी बल्लेबाजी में कभी ब्रैडमैन ने अपना अक्स देखातोहिंदुस्तानी क्रिकेट पंडितों में बरसों तक उन्हें ब्रैडमैन से भी आगे बताने की होड़ रही। सचिन ने छत्तीस बरस की उमर में वनडे में दोहरा शतक जमाया और अड़तीस बरस की उमर में टीम इंडिया को वर्ल्ड कप दिलायातो उन्हें एजलेस यानी सदाबहार करार दे दिया गया । लेकिनएक सीजन की नाकामी में ही बहारखिंजा में तब्दील हो गई । दस पारियों की नाकामी ने मानो सचिन की तमाम कमाई छीन ली । उनकी बल्लेबाजी के जरिए दिनमहीने और साल याद रखने वाले देश में ही एक तबके को उनके जिक्र से भी गुरेज होने लगा।
पूरे टेस्ट करिअर में सिर्फ 135 रन बना पाए कीर्ति आजाद कहते हैं'' मैं सचिन के बारे में बोलकर वक्त बरबाद नहीं करना चाहता।''
सचिन नाकाम हो रहे हैं तो सवाल भी उठेंगे । वो उम्र के उस पड़ाव पर हैंजहां हर नाकामी के बाद उठने वाले सवाल में संन्यास का भी जिक्र होगा । सचिन के लिए राहत ये है कि उन्हें अब भी बीसीसीआई का समर्थन हासिल है। लेकिनबोर्ड भी जानता है कि संन्यास के सवाल को अनंत काल तक नहीं टाला जा सकतातो उसने गेंद सेलेक्टरों के पाले में डाल दी है।
आईपीएल के चेयरमैन राजीव शुक्ला कहते हैं,'' ये सेलेक्टरों का विशेषाधिकार हैसचिन के बारे में उन्हें ही फैसला करने दीजिए।''
करिअर की शुरुआत से अब तक सेलेक्टर्स की विशलिस्ट में पहले नंबर पर रहे सचिन खुद को शायद ही खारिज कराना चाहें। कोलकाता टेस्ट के लिए चयनकर्ताओं ने सचिन पर भरोसा बरकरार रखा है। अगली बार सेलेक्टरों की कसौटी पर कसे जाने के पहले बेहतर होगा कि मास्टर ब्लास्टर खुद को तौलें, सिर्फ दिल की सुनें और तै करेंकि क्या उनकी विदाई का वक्त आ गया है? क्योंकि बकौल सचिन उन्होंने हमेशा खुद पर फेंके गए पत्थरों को मील के पत्थर में बदला है। जाने कब और कैसे इन मील के पत्थरों से बनी उनकी मूरत को 'भगवानका दर्जा मिल गया। हिंदुस्तान कभी नहीं चाहेगा कि नाकामियों की कोई चोट 'क्रिकेट के भगवानकी मूरत पर खरोंच लगाए।

Thursday, November 1, 2012

सियासत में मुहब्बत



सियासत में प्यार मुहब्बत के लिए जगह नहीं होती। प्यार मोह पैदा करता है और मोह राजनीति में तरक्की की राह में बाधा है। किसी के मोह में बंधकर राजनीति की सीढ़ियां  नहीं चढ़ी जा सकती । ये मुहब्बत, ये प्रेम किसी के प्रति भी हो सकता है। जरूरी नहीं कि ये किसी माशूका के प्रति जताया गया मुहब्बत ही हो। मुहब्बत देश से भी हो सकती है। मौजूदा परिदृश्य में अब इस बात का अंदाजा आप आसानी से लगा सकते हैं कि आज देश की ये दुर्दशा क्यों है। सत्ता में बने रहने के लिए देश हित से भी समझौता बड़ी ही सुगम चीज हो गई है। सत्ता का सुख पाने के लिए    राजनीति में बस एक ही मोह सबसे अहम होता है, सत्ता का मोह। इतिहास गवाह है कि सत्ता के लिए भाई ने ही भाई का खून बहाया है।

जहां प्रेम नहीं होता, वहां मर्यादा नहीं होगी। मर्यादा नहीं होगी तो श्रद्धा नहीं होगी और श्रद्धा नहीं होगी तो बदजुबानी पर अंकुश नहीं लगेगा। गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब शशि थरूर की पत्नी के बारे में अशोभनीय टिप्पणी की--वो इसी बात का इंगित है कि सियासत में मर्यादा-शालीनता गई पानी भरने। शशि थरूर ने जब प्रतिक्रिया में मोदी को जवाब दिया तो उसमें एक नसीहत थी कि वो पहले प्यार करना सीखें। लेकिन इस पर जो प्रतिक्रिया बीजेपी से आई,वो और दुखद था। मर्यादा-शालीनता की चादर उतार फेंकते हुए मानो सभी इसका मजा लेने लगे। चटखारे लगाकर। बीजेपी प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नक़वी ने सलाह दे डाली कि थरूर को लव गुरु मंत्री  बना दिया जाना चाहिए। लेकिन मोदी की अशालीन टिप्पणी के बारे में वो कुछ नहीं बोले।

लगता है कि राजनेताओं के लिए एक लवगुरु होना ही चाहिए, जो उन्हें प्यार की भाषा सिखाए। प्रेम की अहमियत सिखाए। ये सिखाए कि प्रेम सिर्फ कुर्सी से नहीं, देश से भी की जा सकती है। सत्ता में परिवारवाद का त़़ड़का लगाने के लिए प्यार सिर्फ अपने बेटे-बेटियों से ही नहीं बल्कि आम जनता से भी की जा सकती है। शायद तब जाकर कहीं राजनीति में भाष की मर्यादा बहाल होगी और राजनेताओं की जुबान फिसलेगी नहीं।

Tuesday, September 4, 2012

एक गांव की कहानी




एक गांव
जहां दर्द रहता है
जो जख्म सहता है

एक गांव 
जहां हाड़तोड़ मेहनत ही गीता है
लेकिन इसका फल कभी होता नहीं मीठा है

एक गांव
जो उम्मीदों में जीता है
भूख लगने पर पानी पीता है

क्या आपको पता है
कहां है ये गांव?
संसद के पास है
इस गांव के लिए कई सपने
पता चल जाय तो
संसद को बता दीजिएगा

एक गांव
जिसे आपसे है आस
आप उसका पता पहुंचा देंगे संसद के पास।

Thursday, July 5, 2012

सन्नाटा





एक दौर था
जब बातें खत्म ही न होती थी
अब सन्नाटा टूटता ही नहीं।
सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के ब्लॉग पर आपका स्वागत है। ऐसे ही आते रहिए, अच्छा लगता है