भूख
है बड़ा अल्लाह न भगवान है, आदमी की भूख ही सबसे बड़ी है
Tuesday, November 22, 2011
एक 'युवराज' का अल्पज्ञान
Saturday, October 1, 2011
बीजेपी की विडंबना
Sunday, July 24, 2011
नमक दाल भी नहीं बेचने देंगे
Saturday, July 23, 2011
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी
Saturday, May 21, 2011
Sunday, December 5, 2010
शीला की जवानी का खौफ
शीला की जवानी से अभी पूरा देश थर्रा रहा है। ऐसी जवानी इससे पहले न कभी किसी ने देखी, न सुनी। लेकिन अब ये जवानी खूब देखी जा रही है, खूब सुनी जा रही। लोग थिरक रहे हैं। शीला के जवान होने का जश्न मना रहे हैं। मुन्नी की बदनामी के सदमे से अभी लोग उबर भी नहीं पाये थे कि शीला अचानक जवान हो गई। ऐसी जवान हुई कि बस हर जगह सिर्फ शीला ही शीला। टीवी खोलते ही शीला एलान-ए-जवानी करती नजर आ जाती है। आधे-अधूरे कपड़ों में।
शीला की इस जवानी का प्रचार-प्रसार को देख सी ग्रेड फिल्मों की शीला और पीले कवर में कैद मस्तराम कपूर जैसे लेखकों की शीला भी मुहं छिपाती फिर रही होगी। या फिर हो सकता है कि पीले कवर वाली शीला शापमुक्त हो गई है। पीले कवर को फाड़ वो सीधे हमारे-आपके ड्राइंग रूम में घुस आई है।
इससे पहले मुन्नी बदनाम हुई थी। ऐसी बदमानी जिसने मुन्नी को पूरी दुनिया में मशहूर कर दिया। बदनामी के इस भोंपू पर वो लोग भी खूब थिरक रहे हैं, जो कभी बदनाम नहीं हुए। मुन्नी की बदनामी में कोई शर्मबोध नहीं है, बल्कि गर्वबोध है। बदलते जमाने के साथ सोच में ऐसा बदलाव खतरनाक ही माना जाएगा, जब बदनामी डराती नहीं बल्कि सीना फूला कर चलने का एहसास देती है। ये सिर्फ हिंदी फिल्मी संगीत में आ रही लगातार गिरावट का ही परिचायक नहीं है बल्कि कहीं न कहीं हमारे चारित्रिक अधो:पतन का भी संकेत है। अब लोग अपनी बिटिया को प्यार से मुन्नी बुलाने से पहले सौ बार सोचेंगे।
हिंदी फिल्मी गानों का ऐसा पतन देख, उन सभी लोगों को बड़ी तकलीफ हो रही होगी, जो बॉलीवुड के उस हसीन दौर के दीवाने हैं, जब गाने के बोल सार्थक होते थे और संगीत कर्णप्रिय। अब तो गाने की एक एक लाइन ही याद रहती है—शीला की जवानी....और मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए। न कोई सिर न कोई पैर, बस संगीत के नाम पर शोर और बोल के नाम पर अश्लीलता की भरमार। मुन्नी और शीला के बाद अब शकीरा के कमर के लोच और ठुमकों को चुनौती देने वाले गाने भी बज रहे हैं।
संगीत पहले साधना थी। गीतकार साहित्य रचने की कोशिश करता था। कुछ नया रचने की कोशिश थी। अब रचना नहीं है, बेचना है और बेचने के लिए वो सब कुछ करने की जरूरत है, जिससे सामान बिक जाय। अब हर आदमी सेल्समैन है, चाहें हो संगीतकार हो या गीतकार। चाहें निर्माता हो या निर्देशक। देखना है बॉलीवुड का ये नया दौर कब तक चलता है। ये भी देखना होगा कि हम और नीचे गिरते हैं, या फिर इससे उबर कर वापसी की कोशिश भी करते हैं।
Friday, December 3, 2010
निकलो कि जैसे निकलता है सूरज

नूर मुहम्मद नूर की कविता
Tuesday, November 30, 2010
ग़ालिब
दिल पर मत लो यार, अमेरिका तो ऐसा ही है
शायद इसे ही कहते हैं मुंह में राम बगल में छूरी।
ओबामा भारत आये तो कह गए कि अमेरिका भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य के रूप में देखना चाहता है।
दूसरी ओर विकीलीक्स ने जो दस्तावेज लीक किये हैं, उसमें उनकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत के इस दावे पर बहुत तीखे तेवर में दिखती हैं। दस्तावेजों के मुताबिक हिलेरी का मानना है कि भारत स्थायी सदस्य का स्वयंभू दावेदार बन गया है यानि कोई चाहे न चाहे केवल भारत ये चाहता है कि वो स्थायी सदस्य बन जाय। और इसलिए उसने अपने अफसरों को संयुक्त राष्ट्र में तैनात भारतीय राजनयिकों की जासूसी में लगा दिया। उन्हें ये जिम्मेदारी दी गई थी कि वो इस बात की पल-पल की खबर लगाएं कि स्थायी सदस्यता हासिल करने के लिए भारतीय राजनयिक क्या कोशिशें कर रहे हैं।
वैसे अमेरिका का ये आचरण किसी के लिए भी चौंकाने वाला नहीं है। अमेरिका आज इसलिए अमेरिका है क्योंकि वो सिर्फ अपने बारे में सोचता है। उसे सब पर दादागीरी दिखानी है, अपनी शर्तों पर अपने हथियार बेचने हैं, दो देशों को लड़ाना है और फिर पंचायत भी करनी है। अमेरिका से हाथ मिलाने वाले भी समझते हैं कि ये दोस्त ऐसा है जो ऊपर से कुछ और अन्दर से कुछ और है। इसलिए इतने अहम दस्तावेज जारी होने के बावजूद कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हुई।
वैसे ये भी हैरानी की बात है कि इन दस्तावेजों को लेकर अमेरिका चिंतित था। इसलिए उसने उन सभी देशों को, जो उसे अपना दोस्त मानते हैं (वो तो दोस्त के नाम पर क्लाइंट ही मानता होगा), आगाह कर दिया था कि भैया, दिल पर मत लेना—ये दस्तावेज संबंध बिगाड़ने वाले हैं।
तो ओबामा भैया, कोई दिल पर क्यों लेगा? जो आपसे दिल लगाएगा वो पछताएगा, आपसे दोस्ती तो दिमाग से ही करनी होगी।
Monday, November 29, 2010
ये मेरा भ्रष्टाचार, ये तेरा भ्रष्टाचार
एक के बाद एक भ्रष्टाचार के ऐसे खुलासे हो रहे हैं, मानो देश में करप्शन में एक दूसरे को मात देकर आगे निकल जाने की होड़ मची हुई हो। मानो घपले में घिरे लोग खुद को एक दूसरे से ज्यादा अव्वल साबित करने पर जुटे हुए हों। जिस रफ्तार से घोटालों का पर्दाफाश हो रहा है, उस रफ्तार से दोषियों की शिनाख्त कर उन्हें दंडित करने की कोई दिलचस्पी प्रशासन या सरकार में नहीं दिख रही।हालिया घोटालों की बात करें तो खेल में करप्शन का जो खेल शुरू हुआ, वो अब थमता नहीं दिख रहा है। खेल से निकल कर टेलीकॉम, फ्लैट, जमीन हर जगह बस घोटाला ही घोटाला। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का भूत अभी खुल कर पूरी तरह सामने भी नहीं आया था कि कारगिल के शहीदों के परिजनों के नाम पर फ्लैट हथियाने का मामला पूरे देश को स्तब्ध कर गया। मुंबई का आदर्श बिल्डिंग सोसाइटी घोटाले में अब एक के बाद एक खुलासे हो रहे हैं औऱ हद तो तब जब जांच प्रगति पर है तो फाइल्स से अहम पन्ने गायब हो गये। यानि घोटाले की जांच भी चल रही है, साथ ही सबूत मिटाने का घोटाला भी चल रहा है।
इस घोटाले ने अशोक चव्हाण की कुर्सी छीन ली। कांग्रेस आलाकमान ने इस्तीफा मांगा और अशोक चव्हाण दिल्ली आकर इस्तीफा सौंप दिया। नैतिक आधार पर इस्तीफा देने की पोस्चरिंग की गई लेकिन काबिले गौर बात ये रही कि अशोक ने इस्तीफा दे दिया। लेकिन कर्नाटक में ठीक इसके उलट घोटालों के गंभीर आरोपों में फंसे बीजेपी के मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा ने बगावती तेवर अपनाकर औऱ संख्या बल का हवाला देकर बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को ऐसी आंखें दिखाईं कि उनसे इस्तीफा मांगने की हिम्मत ही नहीं पड़ी। घोटाले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कर्नाटक के लोकायुक्त श्री हेगड़े ये कहने पर मजबूर हो गये कि राज्य में हर सरकार पिछली सरकार से ज्यादा भ्रष्ट है। यही नहीं अब उन्हें इस बात का पछतावा भी है कि उन्होंने अपना इस्तीफा वापस क्यों ले लिया।
दूसरी ओर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर संसद करीब पिछले दो हफ्ते से ठप पड़ी है। बीजेपी जेपीसी से मामले की जांच कराने की मांग कर रही है और इस बात पर अड़ी है कि जब तक जेपीसी से जांच का ऐलान नहीं होगा तब तक वो संसद नहीं चलने देगी। घोटाले गंभीर है और तह तक इनकी जांच होनी चाहिए और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए लेकिन यहीं उठते हैं, कुछ सवाल जो जवाब मांगते हैं।
जनता जानना चाहती है कि जब बीजेपी येदियुरप्पा से इस्तीफा नहीं ले सकी और उन्हें कुर्सी पर बने रहने दिया तो आखिर वो किस मुंह से घोटाले के मुद्दे पर इस तरह हंगामा कर रही है? मैं ये नहीं कहता कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की उचित जांच नहीं होनी चाहिए लेकिन घोटाला तो घोटाला है, एक घोटाले के लिए एक मापदंड और दूसरे घोटाले के दूसरा। यानि घोटाला दूसरी पार्टी से जुड़ा है तो बड़ा घोटाला और अपनी पार्टी से जुड़ा है तो कोई बात नहीं।
ये बात सिर्फ बीजेपी की नहीं है बल्कि हर पार्टी के साथ कमोवेश यही हाल है। घोटाला देश के साथ धोखा है और घोटालेबाज सिर्फ देश का अपराधी है। उसके साथ वही बर्ताव होना चाहिए, जैसा किसी अपराधी के साथ होता है, न कि पार्टी में पहुंच और ताकत के हिसाब से ट्रीटमेंट। जब तक राजनीतिक दल ऐसा रवैया अख्तियार नहीं करेंगे और घोटाला करने वालों की ढाल बनते रहेंगे, तब तक ने तो दोषियों को सज़ा मिलेगी, न ही घोटाले रुकेंगे। पहल तो राजनीतिक दलों को ही करनी होगी क्योंकि कमोवेश हर घोटाले की अमरवेल उनके दफ्तर से होकर ही निकलती है।