वात्सल्य राय
रन क्या सूखे, देखने वालों की आंखों का रंग ही बदल गया। कभी जो हाथ सजदे में उठते थे, वो अब जैसे पत्थर बरसाने लगे हैं । बुरा वक्त आया तो जुबां की तासीर भी बदल गई । तारीफें करने वाली जुबानें अंगारे उगलने लगीं।
जरा कीर्ति आजाद के तेवर देखिए, वो कहते हैं, '' सचिन के बारे में जितनी कम बात की जाए अच्छा है। हमारे यहां व्यक्ति पूजा होती है,प्रदर्शन पूजा नहीं होती।''
यहां बात उन्हीं सचिन रमेश तेंदुलकर की हो रही है, जिन्होंने तेईस साल तक हिंदुस्तानी क्रिकेट पर पूरे शान से राज किया । जिनकी बल्लेबाजी में कभी ब्रैडमैन ने अपना अक्स देखा, तो, हिंदुस्तानी क्रिकेट पंडितों में बरसों तक उन्हें ब्रैडमैन से भी आगे बताने की होड़ रही। सचिन ने छत्तीस बरस की उमर में वनडे में दोहरा शतक जमाया और अड़तीस बरस की उमर में टीम इंडिया को वर्ल्ड कप दिलाया, तो उन्हें एजलेस यानी सदाबहार करार दे दिया गया । लेकिन, एक सीजन की नाकामी में ही बहार, खिंजा में तब्दील हो गई । दस पारियों की नाकामी ने मानो सचिन की तमाम कमाई छीन ली । उनकी बल्लेबाजी के जरिए दिन, महीने और साल याद रखने वाले देश में ही एक तबके को उनके जिक्र से भी गुरेज होने लगा।
पूरे टेस्ट करिअर में सिर्फ 135 रन बना पाए कीर्ति आजाद कहते हैं, '' मैं सचिन के बारे में बोलकर वक्त बरबाद नहीं करना चाहता।''
सचिन नाकाम हो रहे हैं तो सवाल भी उठेंगे । वो उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहां हर नाकामी के बाद उठने वाले सवाल में संन्यास का भी जिक्र होगा । सचिन के लिए राहत ये है कि उन्हें अब भी बीसीसीआई का समर्थन हासिल है। लेकिन, बोर्ड भी जानता है कि संन्यास के सवाल को अनंत काल तक नहीं टाला जा सकता, तो उसने गेंद सेलेक्टरों के पाले में डाल दी है।
आईपीएल के चेयरमैन राजीव शुक्ला कहते हैं,'' ये सेलेक्टरों का विशेषाधिकार है, सचिन के बारे में उन्हें ही फैसला करने दीजिए।''
करिअर की शुरुआत से अब तक सेलेक्टर्स की विशलिस्ट में पहले नंबर पर रहे सचिन खुद को शायद ही खारिज कराना चाहें। कोलकाता टेस्ट के लिए चयनकर्ताओं ने सचिन पर भरोसा बरकरार रखा है। अगली बार सेलेक्टरों की कसौटी पर कसे जाने के पहले बेहतर होगा कि मास्टर ब्लास्टर खुद को तौलें, सिर्फ दिल की सुनें और तै करें, कि क्या उनकी विदाई का वक्त आ गया है? क्योंकि बकौल सचिन उन्होंने हमेशा खुद पर फेंके गए पत्थरों को मील के पत्थर में बदला है। जाने कब और कैसे इन मील के पत्थरों से बनी उनकी मूरत को 'भगवान' का दर्जा मिल गया। हिंदुस्तान कभी नहीं चाहेगा कि नाकामियों की कोई चोट 'क्रिकेट के भगवान' की मूरत पर खरोंच लगाए।